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Sunday, February 2, 2014

अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए...
















अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए 
सच्चाई लुप्त होती जा रही पढ़नेवालों के लिए 

एक वक़्त था जब हर सुबह रहता था इंतज़ार 
अब मंगवाते हैं आदतन; रश्म निभाने के लिए 

कागज़ भी बेहतर हुवा, छपाई अब रंगीन 
क्या बस यही काफी हे बेहतर बनाने के लिए? 

सम्पादकीय असर में डूबे, लेखों में कसीदे 
पत्रकारिता स्तरहीन पहला बन पाने के लिए 

समाचारों में विज्ञापन या विज्ञापनों में समाचार 
टंटोलना पड़ता है हर कोना समझ पाने के लिए 

'प्रैस' कहलाना औहदा बना, कहीं बना व्यवसाय 
कहीं जरिया जनता को, गुमराह बनने के लिए 

माना कुछ होंगे शायद आज भी सच्चे-ईमानदार 
दौर मुश्किल बड़ा इस राह चलनेवालों के लिए  

अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए... 


Theme by : Shree Navin C. Chaturvedi (http://thalebaithe.blogspot.in/)

श्री नवीन सर के एक फेसबुक स्टेटस से ये विचार आया/ उठाया और आगे जो हुवा वो आपके सामने प्रस्तुत :-)


10 comments:

Blasphemous Aesthete said...

बहुत खूब लिखा है, वाह!

ब्लास्फेमस ऐस्थीट

vishwa said...

Wonderful.....

ILA PANDYA said...

u r d best...!! as always...!!
i agree 2 d point dat now news pprs dn't attract me !!

kamaalnivato said...

Awesome Darling........Classic Thought......bhai...outstanding.....
Such a prakash thing......Bau j jordar..... Hu aavi j koi rah joto hato...k tame alag kathan lakho....majja padi gai....bhai......

Alka Gurha said...

A pleasure to read Hindi poetry. You are right Prakash, journalism is now business. And the moral of the market is to make money. Paid stories, fake stings, biased views .....akhbar sach mein hai raddiwalon ke liye.

Saru Singhal said...

Sadly it is true. It has lost its charm. Now it has more masala than wise words.

Ankur Jain said...

उत्तम रचना..अखबार के ऊपर कुछ पंक्तियां मुझे भी याद आ रही हैं उन्हें आपसे साझा करना चाहुंगा-
"कागज पर रखकर, रोटियाँ खायें भी तो खांये कैसे..खून से लिपटा आता है अखबार आजकल"

संजय भास्‍कर said...

बहुत सटीक

निवेदिता श्रीवास्तव said...

आज के अखबारों की सच्चाई यही है कि विज्ञापन की खबरें हैं या खबरों का विज्ञापन ....

निवेदिता श्रीवास्तव said...

आज के अखबारों की सच्चाई यही है कि विज्ञापन की खबरें हैं या खबरों का विज्ञापन ....

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