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Sunday, January 6, 2013

धागे ख्यालों के, उलझे-उलझे से...














धागे ख्यालों के, 
उलझे-उलझे से 
कई गाँठें भी बन चुकी है इनमें 
कुछ जानें
कुछ अनजानें सुलझाते- सुलझाते 

गाँठें  
क्रोध की, नफरतों की 
रुढियों की, भ्रांतियों की 
अजीबोगरीब आस्थाओं की 
सुलझानें का हर प्रयास 
और उलझनें जैसा है 

एक नुकीली सुई सी 
हमेशा चुभती है 
जिसे सिर्फ महसूस किया जाता है

छोर लम्बा बड़ा 
मिलता नहीं इन धागों का 
न ही छिद्र मिले इस सुई का

ख्यालों की ये उलझन शायद, 
ज़िन्दगी के सुलझने,
और उसे समझनें 
के लिए जरुरी है...

8 comments:

life on new track said...

happy Utrayan, Very Good art to put
the words in appropirate way/situation.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत लाजबाब अभिव्यक्ति,,प्रकाश जी ,,

recent post: वह सुनयना थी,

mridula pradhan said...

bahut achcha likhe hain.....

meghna bhatt said...

this is exact my feelings.

Jyoti Mishra said...

too complicated to make sense..
but this nonsense is what keeps us going :)

Madan Mohan Saxena said...

सुन्दर अभिव्यक्ति.

दिगम्बर नासवा said...

जीवन समझने के लिए उलझन ओर सुल्झान दोनों जरूरी हैं ... पर कई गांठें उम्र भर नहीं सुलझती ...

kamaalnivato said...

bhai....good one....keep it up....

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