THEMES

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Monday, December 9, 2013

कलम की चित्रकारी....





कवितायेँ जो लिख देते हैं तुम पे 
चलते- फिरते,सोते- जागते 
पड़ी रहती हैं, अक्सर 
डायरी- नोटपैड के पन्नों पे
कुछ मोबाइलिया बनी 
त्वरित संदेशों में,  
कुछ कहीं किताबों के बीच 
अकेली, गुमसुम  
तो कुछ अस्त-व्यस्त, बेसहारा
कुछ तो बस खो ही गयी, 
उन्हें याद कर पाना भी मुश्किल है 
हर अनुभव, हर ख्याल तुम्हारा ही तो है 
बस शब्द मेरे हैं टूटे-फूटे
तुम्हे अच्छे लगते हैं न, शायद  

चित्रकार होते
तो बात अलग होती जरा 
कतारें लग जाती तुम्हारी तस्वीरों की 
हर इक अदा को रंग देते, 
हमारे रंगों से
केनवास इतराता खुद पर   
एक संग्रहालय बनाना पड़ता
इन निशब्द मगर 
बोलती तस्वीरों को रखने 
सहेजने खातिर 

माना इस कला से दूर हैं  
पर क्या ये सच नहीं 
मेरे शब्द बना ही तो देते हैं, एक तस्वीर 
हर बार, हर कविता में 
क्या ये नहीं,  
कलम की चित्रकारी ?  

Saturday, November 30, 2013

पल्लवी




पल्लवी और अजय की अभी - अभी कुछ महीनो पहले ही शादी हुई थी।  संयुक्त परिवार में सास- ससुर, भाई-भाभी और उनके बच्चों के बीच वो खुद को ढालने कि कोशिश कर रही थी। कुछ दिनों से अजय की तबियत ठीक नही थी । कई डॉक्टरों  को दिखाने पर भी कुछ ख़ास फर्क नहीं हो रहा था। 

शहरों में दूर के रिश्ते भी बड़े करीब के हो जाते हैं, बस ऐसा ही कुछ करीबी रिश्ता हमारे परिवारों में भी था। 

कल ही संजय भैया, अजय के बड़े भाई का फ़ोन आया था और बता रहे थे। शाम को मैं घर पहुंचा तो सब जानने मिला। "कितनी बार कहती थी बाहर का खाना-पीना कम कर दे, पर मेरी कौन सुनता है।" माँ के गुस्से में चिंता साफ़ दिख रही थी। अजय वहीँ पास में सो रहा था, काफी कमजोर पड़ गया था। संजय भैया से थोड़ी देर बात हुई, और फिर मैं घर कि और रवाना हुवा।   

दो दिन बाद सुबह-सुबह फ़ोन आया हेल्लो ! आज कॉलेज से छुट्टी ले सकते हो क्या ? थोडा काम हैअजय को हॉस्पिटलाइज़े किया है; दुकान पर भी आदमी छुट्टी पर है बस आज के लिए आ जाओ। ना कह पाने का कोई विकल्प नहीं था। ठीक है, आता हूँ थोड़ी देर में। फटाफट तैयार होकर उनकी दुकान के लिए निकला, रास्ते में मैं सोच रहा था 'आज का कॉलेज का बंक किसी के काम आएगा वर्ना अक्सर तो यूँ ही यार-दोस्तों में, फिल्म देखने और घूमने-फिरने में चला जाता है। 

दुकान पहुंचते ही मैं और संजय हॉस्पिटल रवाना हुवे। "आप रुकिए यहाँ, डॉक्टर कि विजिट का टाइम है मैं होकर आता हूँ", संजय ने पिताजी से कहा। डॉक्टर विजिट को निकल चुके थे, चैम्बर खाली देख हमने अंदाज़ा लगाया।  हॉस्पिटल में चहलकदमी बढ़ गयी थी, रूम तक पहुंचे तो डॉक्टर अजय कि जांच कर रहे थे, उनके साथ असिस्टेंट डॉक्टर्स, नर्स आदि का पूरा काफिला था।  "कुछ टेस्ट लिखे हैं, अभी करवा लीजिये, रिपोर्ट के साथ शाम को मिलिए" डॉक्टर ने संजय से कहा। सिस्टर ने ब्लड बैंक में फ़ोन कर दिया। 

पल्लवी अजय के बेड क पास ही बैठी थी , मैं बहार आ गया। संजय फ़ोन पर थे मैं सजनी भाभी (संजय कि पत्नी) के पास बैठ गया और बिना विलम्भ किये क्या हुवा जानने कि कोशिश की। 'अच्छा हुवा आप आ गए, संजय काफी अकेले पद गए थे, दो दिन से दस्त और उल्टियां हो रही थी, खांसी और कफ भी इतना हो रहा हैकल तो रात भर यही चला इसलिए आज सुबह यहाँ लाये और डॉक्टर ने देखते ही एडमिट कर दिया, दो बोतल चढ़ बाये हैं।' वो पूरा एक सांस में केह गयी। 

तभी लैब अटेंडेंट आ गया, उसने ब्लड सैम्पल्स कलेक्ट किये और मुझे रसीद देकर शाम को कलेक्ट करने को कहा। भाभी ने पूछा कौन-कौन से टेस्ट करवाये हैं, हेमोग्लोबिन तो कम ही आएगा, कहीं चिकनगुनिया न हो जाए आज कल रोज पेपर में आ रहा है। संजय ने मुझे भाभी को घर ड्रॉप करने को कहा। पुरे दिन घर, दुकान और हॉस्पिटल  के चक्कर चलते रहे।

शाम को रिपोर्ट लाने मुझे ही जाना था, मैंने रिपोर्ट कलेक्ट की और जिज्ञासापूर्वक खुले लिफ़ाफ़े से रिपोर्ट निकाली। अटेंडेंट ने दस्तखत करने को कहा और पूछा पेशेंट कौन है? मैं इस सवाल को समझ नहीं पाया, ज्यादातर मरीज कौन है ऐसा कोई पूछता नहीं। रिपोर्ट देखते ही मैं चौंक गया HIV Antibody Test - Reactive/ +ve… मैं बस वहीँ बैठ गया और कुछ समझ नहीं पा रहा था तभी फ़ोन बजा 'कहाँ हो, रिपोर्ट मिली? क्या आया देखो जरा? तुम्हे थोडा समझ आ जाएगा, मुझे तो अंग्रेजी आती नहीं।' हाँ भैया, बस आता हूँ ! सब नॉर्मल ही लग रहा है...मैंने फ़ोन पर कुछ बताना उचित नहीं समझा।

हॉस्पिटल पहुँचते ही ‘चलो जल्दीडॉक्टर साहब से मिल लेते हैं, मेरे ना चाहते हुवे भी वो मुझे चैम्बर में ले गए। रिपोर्ट्स देख डॉक्टर ने कहा एक टेस्ट पॉजिटिव आया है लेकिन रिकन्फर्म करने के लिए बड़े एडवांस लैब से भी एक रिपोर्ट करवा लेते है। सर, डू यू सजेस्ट फॉर पल्लवी टू? मैंने पूछा। ओ यस, आई वाज कमिंग ऑन देट. उनका भी करना है मैं लिख देता हूँ, मेडिकल स्टूडेंट ? उन्होंने मुझसे पूछा, 'नहीं थोडा बहुत पता है इस बारे में' मैंने उत्तर दिया और हम दोनों बहार आ गए।      

माहोल और भी चिंताजनक हो गया था। 'तुम तो केह रहे थे सब नॉर्मल है, क्या आया है देखो जरा ध्यान से ! और ये पल्लवी का टेस्ट क्यूँ करना है ?... मैं समझ नहीं प् रहा था कि संजय को कैसे बताऊँ। मैं लैब वाले को बुलाने का बोल के आता हूँ आप अजय के पास चलिए, वहीँ बैठते हैं।  

वहाँ से निकला तो सामने सजनी भाभी आते दिखे, 'क्या आया रिपोर्ट में ? चिकनगुनिया तो नहीं है नजो भी आया है बताइये, संजय भी कुछ बता नहीं रहे ..प्लीज भैया, और ये पल्लवी का टेस्ट क्यूँ कर रहे हैं.. उनसे छुपा पाना मुश्किल था इसलिए वहीँ पास बिठा कर मैंने रिपोर्ट बताया।  उन्हें समझने में देर न लगी फिर भी खुद को सँभालते हुवे, दूसरी रिपोर्ट में नेगेटिव आ जाए भगवान् !  पर ये हुवा कैसे? मैंने पूछा इधर में खून चढ़ा था क्या कभी, उससे इन्फेक्शन आ सकता है? 'नहीं मेरी शादी के बाद तो अजय पहली बार इतना बीमार हुवे हैं, पहले का पता नहीं।' अभी वाली रिपोर्ट तो सुबह ही आएगी, तब ही पता चलेगा कुछ।

सुबह लैब ऑफिस से मैंने रिपोर्ट ली और तुरंत पेपर्स देखने लगा ..ये रिपोर्ट भी पॉजिटिव ही थी। दूसरी रिपोर्ट पल्लवी भाभी की थी, HIV Antibody Test Result : Reactive/ +Ve... 

अजय अक्सर घर देरी से आते, खाने-पीने का बेहद सौखीनडेली फाइनेंस व् डेली कलेक्शन का काम करता था इसलिए ज्यादातर घूमता ही रहता था। यार दोस्ती भी काफी थी, ज्यादातर अड्डेबाजी ही करते थे।  एक-दो बार मैंने नाईट शो मूवी से घर जाते हुवे ऐसे ही दोस्तों के साथ देखा था।  याद आ रहा था एक बार कुछ लड़कियां भी थी उन सब के साथ में। मैं सब कुछ रिलेट करने कि कोशिश कर रहा था। कई सवाल घूम रहे थे दिमाग में... 

कॉलेज में और कुछ एन.जी.ओ के साथ मैं कई बार एच आई वी / एड्स अवेरनेस स्किट्स में भाग ले चूका था इसलिए रोग के बारे में पूरी जानकारी थी पर करीबी कोई इससे ग्रसित होगा ये नहीं मान पा रहा था। लैब से हॉस्पिटल का रास्ता इसी सब सोच में चला गया। 

सजनी भाभी ने दूर से मुझे देखा , मुझे देख कर ही मानो वो समझ गयी पर फिर भी उन्होंने पूछा ..  पॉजिटिव ? मैंने कहा दोनों की पॉजिटिव ... पल्लवी की भी ? आंसुओं को रोक पाना मुश्किल था।  

डॉक्टर ने रिपोर्ट पर संजय से बात की, उन्हें दोनों कि रिपोर्ट सुनते ही चक्कर आ गया, थोडा सम्भल कर वो बैठ गए। देखिये पल्लवी को अभी विंडो पीरियड में है इसलिए जल्दी कंट्रोल में आ जायेगा, पर अजय को थोडा वक़्त लगेगा। दूसरा इस रोग का प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज काफी महंगा पड़ेगा आप चाहें तो गवर्नमेंट ऐडेड ट्रीटमेंट करवा सकते हैं, आप सोच लीजिये वहाँ भी ट्रीटमेंट अच्छा ही होगा चिंता कि कोई बात नहीं है।

थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने अजय और पल्लवी को मिले 'देखिये आप दोनों का रिपोर्ट एच आई वी पॉजिटिव आया है, यह एक वायरस है जो कि खून के इन्फेक्टेड होने पर पाया जाता है, आम भाषा में इसे एड्स भी कहते हैं। इलाज सम्भव है और आप एक सामान्य जीवन जी सकते हैं, हाँ कुछ ख़ास बातें ध्यान रखें .. परहेज और नियमित जांच, दवा से सब कुछ नियंत्रित रह सकता हैआप अब फेमिली नहीं प्लान कर सकते, ऐसा अक्सर पाया जाता है कि संतान भी इस वायरस से एफेक्ट होती है।  शारीरिक सम्बन्ध जहाँ तक हो न बनाये और कंडोम का इस्तेमाल करें। कभी भी किसी को खून न दें इससे ये वायरस औरों में फ़ैल सकता है। एक दूसरे का ध्यान रखिये, एक-दो टेस्ट और करवाने हैं उसके बाद दवाई शुरू करेंगे। पल्लवी भाभी पर मानो आसमान फट गया हो, हर तरफ बस आंसू बह रहे थे। 

आंसुओं के साथ सवाल हर किसी के चेहरे पे थे, आखिर ये हुवा कैसे, क्या कारण होगा ? सजनी भाभी को न जाने कहाँ से मेरी खून लिया था क्या वाली बात याद आयी और मुझे बहार ले जाकर पूछा और किस कारण से होता है ये रोग ? मुझे नहीं पता, मैंने टालने कि कोशिश की, बताता भी कैसे और क्या .. वे बस मुझे देखती रही।

'तीन कारणो से ये रोग ज्यादातर होता है: असुरक्षित यौन सम्बन्ध, इन्फेक्टेड नीडल से खून लेने/ इन्फेक्टेड पेशेंट का खून ले लेने पर, या फिर जन्म के समय माता या पिता का इन्फेक्टेड होने पर' किसी न किसी को बताना जरूरी था ये सोच मैं तेजी से सब बोल गया। पर सवाल अब थमने वाले नहीं थे 'मतलब पल्लवी से अजय को हुवा ? मैंने तुरंत कहाँ नहीं वैसा तो नहीं हो सकता क्यूंकि उन्हें अभी इनिशियल स्टेज पे है। शायद वो और भी कुछ पूछती पर रोकते हुवे मैंने पल्लवी भाभी को सँभालने को कहा वे रोये जा रही थी। 

शाम होते-होते दूसरे टेस्ट रिपोर्ट भी आ गए और ट्रीटमेंट शुरू हुवा। आप लोग घर हो आइये थोडा आराम कर लीजिये मैंने संजय भैया और सजनी भाभी को कहा, मैं यहाँ रुकता हूँ ..वे जा नहीं रहे थेकिसी तरह उन्हें घर भेजा। मैं भी बुरी तरह थक गया था इसलिए वही रूम के बहार बैठ गया, घर पर फ़ोन कर साड़ी बात बतायी और दूसरे मिस्ड कॉल्स, मेसेज देखने लगा।  तभी पल्लवी भाभी बहार आयी , मैं उन्हें देखते ही पूछा कोई प्रॉब्लम भाभी ? आपसे एक बात पूछनी है, उन्होंने कहा और मेरे पास बैठ गयी। मैं सोच रहा था आखिर मैं रुका ही क्यूँ, अब और सवाल ! हाँ बोलिये भाभी कोई काम, कुछ लाना है

एक बात बताइये आंसू पौंछते हुवे उन्होंने पूछा 
'ये किससे किसको हुवा, इन्हे मुझसे या मुझे इनसे ???'

आज चार साल हो गए, पल्लवी और अजय सामान्य जिंदगी जी रहे हैं, रेगुलर ट्रीटमेंट चलता है। पर जब भी उन्हें देखता हूँ या उस दिन को याद करता हूँ तो ख्याल आता है कि अगर उस दिन भूल से भी मैं कुछ उत्तर देता तो आज शायद दो जिंदगियां साथ नहीं होती। कम से कम आज दोनों साथ तो हैं। पर साथ ही साथ गुस्सा भी बहुत आता है, पता नहीं क्यूँ पर अजय पर ही। वो सवाल आज भी कानो में गूंजता है अक्सर  
  


  


 Note: This was my first attempt in story writing. 

Wednesday, September 18, 2013

शिक्षा का अधिकार...Dark side of the story


शिक्षा का यूँ तो हम सबको अधिकार मिला है 
कहीं मुफ्त पुस्तकें- बस्ता, कहीं आहार मिला है 
कहीं दिखावी दाखिले, कहीं कागज पर स्कूल 
कहीं साइकिल, कहीं लैपटॉप,ये कैसा सिलसिला है 

शिक्षा प्रोत्साहन के क्या बस अब यही रह गए तरीके 
एक अध्यापक, विषय अनेक, क्या पढ़ लें, क्या सीखें
पापी पेट बड़ा दुखदायी, गरीबी सब कुछ भुलाती है 
किताबें- बस्ते सब बिक जाते, मजबूरी बिकवाती है 

बचपन देश का आज बाल मजदूरी से मैला है 
हर गली-नुक्कड़ चायवाला, बालक ही मिला है    
चाहता वह भी पढना, देखे अक्सर सपना है 
सपने और हकीकत में, फासला धुंधला है 

शिक्षा का यूँ तो हम सबको अधिकार मिला है... 

Theme by: Ms.Sonal Jain

Sunday, September 8, 2013

सब्र का फल...

बड़े- बुज़ुर्ग कह गए 
सब्र का फल मीठा होता है 

यही सोच कर, कल्पनाओं में  
एक पौधा लगाया हमने भी, सब्र का 
नियमित सिंचित कर रहे पानी से 
गाढ़ी क्यारियां बना दी है; 
कहीं पानी बह न जाए 
पर्याप्त खाद;
जरुरी कीटनाशक
सब उपयोग करते रहे हैं
काफी रख - रखाव करना पड़ता है 

कार्य मुश्किल तो है 
पर फल का लालच 
उत्साह बढाता है हरदम 
और क्रम ये जारी है बरसों से 

किसीने पूछा आज 
कौन से फल आयेंगे तुम्हारे इस पेड़ में ?
कब आयें हम चखने ? 
जवाब हमने भी दे दिया 
ये हमारा कल्पवृक्ष है, सब्र का  
फल होंगे इसपे नाना प्रकार के 
सुख के, सम्पति के, 
सफलता के, सम्मान के 
कुछ संतुष्टि के, थोड़े ईमान के 
और थोड़े एक-आध जीवन ज्ञान के 

कह तो दिया, कहने को 
पर इंतज़ार तो हमे भी है 
कब ये फल होंगे, 
ये इंतज़ार... 
सब्र का फल मीठा होता है न ! 

Monday, September 2, 2013

गरीब - अमीर














कहीं तन पे नहीं कपडे, 
कहीं कपड़ों में खुला तन  है 
पहला निर्धन कहलाता 
दूजे पे हावी फैशन है 

भिक्षुक ये भी, भिक्षुक वो भी है 
ये देवालयों के बाहर, और वो अन्दर 
ये मांगता भीख, देता दुवाएँ 
वो प्रार्थनाओं में रखता दान-धन है 

है दोनों बेसहारा, दीन 
ये धन से, वो मन  से 
इसे पेट की चिंता है 
और उसे पेट से ही (औलादों) चिंतन है   

सपने देखते हैं दोनों एक से
सुख के, सम्पति के, सम्मान के 
पर इन्हें पाने में अक्सर 
करते गलत रास्तों का चयन है 

काश ! ऐसा हो पाता कभी 
आचार मिलते विचारों से  
होते सब समान, एक से 
सोचें तो होता काफी मन-मंथन है...   

कहीं तन पे नहीं कपडे......



Tuesday, August 13, 2013

हाय ! क्या Touch है...

मेरे वड़ोदरा (गुजरात) के मित्रों में एक तकिया कलाम खूब प्रचलित हुवा "Touch है". इसका उपयोग किसी भी बात के वजनदार होने पर, किसी खुशनुमा हादसे के वर्णन पर, किसी अनोखे अनुभव आदि पर प्रचलित हुवा । मतलब शायद यही था की बात अनोखी है, दिल को छु गई।  बस यही से इस तकिया कलाम को उठाया, कुछ मित्रो के Touching अनुभवों को अपने मसाले के साथ खयाली पुलाव में आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ....लुत्फ़ उठाइये:-)     

Touch hai...

बातों में,
मुलाकातों में,
कहे- अनकहे जज्बातों में 
नज़रों के मिलने में 
और फिर शर्म से झुक जाने में 
हाय ! क्या Touch है...

वो कॉफ़ी की टेबल 
था Date का Label  
हाथों के टकरानें में     
और चौंक कर सहम जाने में 
हाय ! क्या Touch है...

बातें लम्बी-लम्बी, 
उन्हें सुनते चले जाने में 
हिलते हुवे होठों पे नज़रों के ठहर जाने में 
Mug share हुवा जो कॉफ़ी का; 
एक ख़ास जगह से पी जाने में 
हाय ! क्या Touch है...

शेर दूसरों के,
तारीफों में 
Personal से बनाने में 
उनको समझते हुवे हमारा  
हंसने में- मुस्कराने में 
हाय ! क्या Touch है...

ख़त्म वक़्त के होने में; 
थोडा रुकने को मनाने में 
वो जाते- जाते मुड़ने में, 
और फिर ठहर जाने में 
हाय ! क्या Touch है...

वो फिर मिलने के वाडे के संग 
आलिंगन (Hug) जो पाया था 
कमबख्त, 
आज भी छटपटा जाते हैं 
यादों में भी.... 
हाय ! क्या Touch है...

Saturday, May 25, 2013

सैलाब...

मन में सैलाब बहता- उफनता रहा है 
धैर्य ना जाने क्यूँ फिर पनपता रहा है 

सोचा जहाँ कहीं भी बस, ठहर जाने को 
वक़्त अचानक सिकुड़ता- सरकता रहा है 

करेंगे इबादत पर ना मोहब्बत किसी से 
मौसम ख्यालों का दिनों-दिन बदलता रहा है     

परेशानियाँ आती जाती रही यूँही निरंतर 
जीवन हर बार बिखरता - संभलता रहा है 

मन में सैलाब बहता....

-

कमाल - प्रकाश 
(मित्र कमाल और मेरा साथ में लिखने का ये दूसरा प्रयास...) 
Prakash-Kamaal



Sunday, March 31, 2013

CKD से CCD... C-चाय K-की D-दुकान से Cafe Coffee Day







CKD से दुनिया मुड़ी अब CCD की ओर 
कटिंग नहीं मिलती यहाँ, पॉकेट कटती है Sure 

बातें जो गप भी कहलाई, यहाँ बनी वो Gossip
चुक्कड़-ग्लास बने Mug, चुस्की कहलाये है Sip 

अड्डेबाजी जो कहलाती थी, यहाँ बनी Network
Social, Professional, कहीं Virtual सम्पर्क 

अंग्रेजीपना यहाँ हरतरफ बातों में छलकता है 
चीनी का चम्मच पहले, अब Sugarbag बन मिलता है 

वक़्त बदलता है, बदलते हैं हम, और तौर- तरीके 
मिलना-जुलना पर जरुरी, भले बदले Trend-सलीके

Insider: An observation got added with some words just while waiting at a CCD for a meeting for so called "networking". Having enjoyed and loved both the ways out, just thought of relating both a bit. Hope you enjoy: too :-) 

Sunday, March 24, 2013

उदास रहते हैं अक्सर...

Autumn in Ladakh - Image Courtesy: Harshal Jariwala















उदास 
रहते हैं अक्सर 
कभी आप किसीसे 
तो कभी कोई आपसे 

रूठना, मनाना 
चिढना, कभी चिल्लाना
बेवजह का गुस्सा
खुद ही में झुँझलाना 
यही उदासी फिर निराशा बन जाती है  

ये होता है हरदम 
कि जहाँ प्यार गहरा हो 
सम्बन्ध हो भावुक,
मेल-जोल  गहरा हो 

आशाएं और अपेक्षाएं 
इस पुरे फसाद की जड़ है 
पर इनका नियंत्रण मुश्किल है 
शायद, ये मनुष्य की प्रकृति है 

क्षणिक ही सही
पर ये भी जीवन का एक रंग है 
इसकी परछाई सी होती है ख़ुशी 
बस होता उमंग है...

Monday, February 11, 2013

प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है...

Frank हो गया है
Selfish हो गया है, 
प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... 

ना Dependence किसी पे; 
ना ही Expectation की बातें,
Pairing का है जमाना, 
Bluetooth जम गया है...
प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... 

Flirting है कहीं ये;  
कहीं Intimate मस्ती, 
तो कहीं बस Bills चुकाने का;  
Resource हो गया है... 
प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... 

एक, दो, तीन, नया Affair नये दिन;  
SMS, wassup, call ,mail 
Online मामला Relationship का 
Status बेचारा Confused हो गया है... 
प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... 

कहीं-कहीं ये आज भी; 
है सच्चा Soulful,
Google/ खोज का विषय ये 
Analytical हो गया है...

प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... 

Saturday, February 2, 2013

पेड़ चल रहे हैं...

Courtesy: Harshal Jariwala

Courtesy: Harshal Jariwala
पेड़ चल रहे हैं 
कभी भागे जा रहे हैं 
दूर कोरे मैदानों में,

खेतों में कहीं तैयार फसल 
तो कहीं लंबी मेड़ें 
मानो 
किसीने मैदानी चित्रकारी की हो 

तभी नज़र आया  
बैलों के साथ खेत जोतता किसान 
याद दिला गया 
की हमारा देश कृषिप्रधान है 

कुछ पहाड़ भी आये-गये 
बड़ी तेजी से 
पर उनकी स्थिरता दूर तक दिखाई देती रही

कहीं-कहीं बड़े पत्थरों पर 
बिना किसी सहारे टिके पत्थर 
बड़े हतप्रभ करनेवाले थे 

नदियाँ, तालाब, पोखरे 
और उनके आस-पास 
रोजिंदा कार्य करती महिलाएं 
पानी पीते, नहाते पशु 
बड़ा अजीब लगा देख खुले में शौच करते लोगों को 
हमें विकसित कहलाने में 
अब भी वक़्त है   

मदिरों, मस्जिदों से 
आयी कही आरती, अजानों की आवाजें
दूर दिखे कुछ बच्चे वेशभूषा में  
और पास ही एक स्कूल 
स्मृतिपटल पर 
अपना बचपन याद आ गया 

तभी अचानक बदलती पटरीयाँ
करीब आते कुछ मकान, 
सड़क, रेल के ढाले
और कतारों में रुकी गाड़ियाँ व् लोग 
बता रहे थे की कोई स्टेशन आ रहा है     

सफ़र बड़ा अदभूत है 
भारत का हर रंग
लगता है; 
ट्रेन की इस खिड़की से गुजर रहा हो...


-
Poetry written in train on 19.01.2013 while travelling from Secunderabad towards Vadodara.. 
  
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