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Sunday, August 19, 2012

दोस्त खुद ही के होकर देखिये...

आत्मीयता स्वयं से कर के देखिये
दोस्त खुद ही के होकर देखिये 

कि साथ भी मिलेगा, सहारा भी 
थोड़े मन के होइये, खुद को टटोलिये

आसान लगेगी ज़िन्दगी की कसौटियाँ
परिवर्तन होगा महसूस कर के देखिये 

दोस्त सच्चे मिलेंगे चंद ढूंढे पर 
खुद सा सच्चा कोई कहाँ, ये तो सोचिये 

दोस्त खुद ही के होकर देखिये 



The thought here of "friendship with self" is inspired and further carried forward from a reading on Jain Darshan and also is rooted in Bhagwad Gita. 

8 comments:

Ragini said...

really....good thought!!

dheerendra said...

दोस्त तो बहुत मिलते है पर सच्चा दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलता है,,,,,

RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,

Reena Maurya said...

बात तो सही है...
सुन्दर भाव लिए रचना...
:-)

sushma 'आहुति' said...

sachi baat kahi apne....

सतीश सक्सेना said...

प्रभावशाली पोस्ट...

Blasphemous Aesthete said...

Very true!

VIJAY KUMAR VERMA said...

भावपूर्ण रचना, बधाई.

Pratiksha said...

Excellent thought.... very very nice

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