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Sunday, July 8, 2012

एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते हैं लोग ...


















कहते-कहते ही संभल जाते हैं लोग
पलक झपकते ही बदल जाते हैं लोग

कितना आसान है झूठ कहना-सुनना
पकडे जाने पे, सकपकाते हैं लोग

स्वार्थी ये दुनिया, रिश्ते-नाते समाज
अचानक ही अपनापन जताते हैं लोग

बेवकूफ पैदा ही नहीं होते अब जहाँ मैं
चालाकी खून में ही अब पाते हैं लोग

कौन सच्चा, कौन झूठा, समझे कोई कैसे
एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते  हैं लोग

होड़ लगी है सबमें कुछ कर दिखाने की
इसीमें रास्ता थोडा सा भटक जाते हैं लोग

एक खोज ही होगा मनुष्य को समझना
इन्ही कोशिशों में आते, चले जातें हैं लोग...

11 comments:

KK said...

Bahut khub!Ek khoj hi hoga manushya ko samajhana! Inhi koshishon mein aate jaate hain log!

ILA PANDYA said...

beautiful....as alwayz..!! just correct'CHUPAATE' instead of 'CHUPATE'.CARRY ON...WID D ULTIMATE KHOJ...:-)

meghna said...

nice

dheerendra said...

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग,,,,

RECENT POST...: दोहे,,,,

शिवनाथ कुमार said...

बहुत खूब ....

S.N SHUKLA said...

कौन सच्चा, कौन झूठा, समझे कोई कैसे
एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते हैं लोग
sundar aur sarthak, badhai.

दिगम्बर नासवा said...

खूबसूरत शेरों से सजी लाजवाब गज़ल .... बधाई ..

dheerendra said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर रचना,,,,,

RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

Shashank said...

Nice one... liked the last lines a lot... Keep it up mate...

expression said...

वाह....
बहुत बढ़िया गज़ल....
लाजवाब शेर कहे हैं.....

अनु

आशा बिष्ट said...

ekdm sahi..kaha..prakash...

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