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Thursday, May 31, 2012

बड़े गिरगिटीया हैं हम...

बड़े गिरगिटीया हैं हम,
कितने रंग बदलते हैं... 
कमबख्त मौसम, माहोल,
सब फ़िज़ूल है इंसानी रंगों में... 

अभी कुछ पल पहले ही जो 
मुस्कुरा रहे थे 
अब आग उगल रहे हैं 
जोरो चिल्ला रहे हैं 



की दूजे ही पल शांत
ख्यालों में खोये से 
पलक झपकी नहीं की
की मन ही मन बडबडा रहे हैं 

तारीफ कर भी दी किसी की कहीं 
माहोल बदला, अपशब्द बरसा रहे हैं 
कभी कोसे खुद को, कभी औरों को  
बेचैन से हैं, थोड़े पगला रहे हैं 

मजाकिया मिजाज़ कहा जाता है 
पर हम तो मिजाजी बने जा रहे हैं 
रहस्य गहरा है इन इंसानी रंगों का 
सोचिये आप कितने रंग अपना रहे हैं 

बड़े गिरगिटीया हैं हम...

*गिरगिटीया- Chameleon types...

12 comments:

Ruchi Jain said...

exactly, u will not gonna beleive, i was just talking to my frnd the same 5 mins earlier,, that
evrbody shows his or her color,, not negatively,, but we do at times..

meghna said...

very appropriate in today`s world.
nice one..

dheerendra said...

वाह ,,,, बहुत बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर रचना,,,,,

RECENT POST ,,,, काव्यान्जलि ,,,, अकेलापन ,,,,

Reena Maurya said...

sahi kaha kitane hi chehare hai insan ke
jo pal bhar me badalta rahata hai..
bahut hi behtarin rachana:-)

अनुपमा पाठक said...

बात तो सच्ची है...!

Jyoti Mishra said...

human mind is capable of so many things..
changing attitudes, perception and outlook is one of the few dangerous ones..

शिवनाथ कुमार said...

क्या खूब लिखा है ...
बढ़िया ...

Shashank said...

Nature of humans explained beautifully...

babanpandey said...

बहुत ही साथक और सामयिक लेख ....मेरे भी ब्लॉग पर पधारे
http://babanpandey.blogspot.in/2012/06/blog-post.html

prachi said...

Great Prakash, Very True...

Anonymous said...

Awesome as usual.


-Rashmi Fadnis

Pushpendra Sinora said...

Bade Girgitiya hai hum.... 👌

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