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Saturday, April 21, 2012

कुछ इस तरह से...

कुछ इस तरह से तुम ज़िन्दगी में छाई हो
मैं ठण्ड हूँ गर तो, तुम मेरी रजाई हो ...
कुछ इस तरह से...


मैं दूध का पतीला, पूरा भरा हूवा सा
तुम उसपे जमी हुई, गाढ़ी सी मलाई हो...
कुछ इस तरह से...


मैं बुझा हूवा सा जर्जरित सा लालटेन
तुम ही हो बाती, तुम ही दियासलाई हो...
कुछ इस तरह से... 
 
मैं भोजनालयों का जला हुआ सा बर्तन
तुम उसपे जमी हुई, सख्त सी चिकनाई हो...
कुछ इस तरह से... 


मैं सरकारी दफ्तरों का पुराना सा टेबल 
तुम फाइल वजनदार, कभी अंडर-टेबल कमाई हो...
कुछ इस तरह से...  

मैं अनदेखा - अनपढ़ा सा फसबूकिया पेज 
हजारों फोलोवर्स वाली तुम,सुपर एक्टिव प्रोफाइल हो...
कुछ इस तरह से...  

मैं समझा हूवा सा गंवार, नासमझ
तुम अनसुलझी गुत्थी, विकट कठिनाई हो...
कुछ इस तरह से...

15 comments:

meghna bhatt said...

aree..awesome...
bartan n chikanai..too funny..
n last one does the trick :D

dheerendra said...

बहुत सुंदर,...

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

vishwa.... said...

Khub j saras hasya kavita che.... bahuj saras....

Rashmi Fadnis said...

Very nice.

Jyoti Mishra said...

lol maza aa gya :)

Blasphemous Aesthete said...

पूरी कविता का रस अंतिम पंक्तियों में सिमट आया|

:)

Nikita said...

hehe...too good!!

mridula pradhan said...

achcha hasya hai......jari rakhiye......

Ayodhya Prasad said...

सुन्दर कविता...मज़ा आ गया |

Kailash Sharma said...

बहुत खूब !

Reena Maurya said...

बहुत ही बढ़िया हास्य कविता....

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत खूब जिक्र इस कठिनाई का

Ruchi Jain said...

haha,, BHojanalaya,,being a Jain,, i had visited so many of them,, :)

life on new track said...

beautiful

पंछी said...

hehe ... बहुत खूब

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