THEMES

LIFE (52) LOVE (28) IRONY (25) INSPIRATIONAL (9) FRIENDSHIP (7) NATURE (3)

Saturday, December 29, 2012

कभी बातें होती थी रोजाना...

Photo by : Jinit Soni














कभी बातें होती थी रोजाना 
अब आहटें सालाना 
कि न बदले हैं हम, 
न बदला है तू शायद 
पर कितना बदल गया है ज़माना 

कि लम्हा वो ठहर गया होता 
थोडा जी लेते 
और ज्यादा क्या होता ?
माहोल कुछ और ही होता 
इस आज में 
न इस तरह होता जिक्र 
न पड़ता बतियाना 

कभी बातें होती थी रोजाना... 

Sunday, November 11, 2012

चलो फिर नये से शुरू करते हैं...












चलो फिर नये से शुरू करते हैं 
एक शहर नया, 
एक बस्ती नयी 
एक मकान नया सा चुनते हैं 
कि नयी बस्ती- मकान में 
बातें पुरानी करते हैं।  

चलो फिर नये से शुरू करते हैं...

नय़े चेहरे, 
नये लोगों में 
साथ नया सा ढूंढते हैं 
उन लम्हों में खुद को 
यादों से बचाया करते हैं।  

चलो फिर नये से शुरू करते हैं...  

सामान बिटोरा,
सारा बोरिया-बिस्तर, 
ले आये सारा नए शहर 
ये नया मकां 
कभी घर होगा 
इस आस सजाया करते हैं। 

चलो फिर नये से शुरू करते हैं... 


काफी कुछ लेकिन
बिखरा-टूटा, 
इस बिटोरने-सजानें में 
अश्कों को नहीं बहने देते 
हँसते हैं, हँसाया करते हैं।     

चलो फिर नये से शुरू करते हैं... 

Wednesday, October 17, 2012

सुबह थोड़ी सी अलसाई होगी

A Painting by Raja Ravi Verma 

नूर आज फिर चेहका होगा 
सुबह थोड़ी सी अलसाई होगी 
किरणें पर्दों की जालियों से छनकर 
तुम्हे छुकर थोडा इतराई होगी 

गुनगुना रही होगी तुम वो 
गीत वो थोड़े हमारे से
ख्यालों के शीतल पानी से 
अलमस्त नहायी होगी  

वो भीनी जुल्फें तुम्हारी 
उलझी ज़िन्दगी सी 
हमें ही सोचते हुए 
सुलझाई होगी 

आँखें खोई सी ख्वाब बुनने में 
आइना देख थोडा शरमाई होगी 
होठ सुष्क, हंसी चेहरे पर  
आभा हरतरफ जगमगाई होगी 

आज भी तुमने  
की होगी प्रार्थना 
कुशलता हमारी भी उसमे  
चाही होगी 

नूर आज फिर चेहका होगा 
सुबह थोड़ी सी अलसाई होगी 

Tuesday, September 25, 2012

पैसे पेड़ों पे उगते जो...

पैसे पेड़ों पे उगते जो  
कितनी खुशहाली होती
हर सख्स बनाता बगीचे 
हर तरफ हरियाली होती 

ना महंगाई पे दुःख होता 
ना कम आमदनी का रोना 
लोग रहते भी इन पेड़ो पे 
जंगल भरता हर कोना 



गरीब  कहीं ना ढूंढे मिलते 
अमीर बनता हर जन-मन 
न घोटाले, न भ्रष्टाचार 
न काला होता गोरा धन 

पर इसमें भी ये नेता 
अपना लोहा मनवाते
अन्न उगाने पर प्रतिबन्ध 
पैसों के पेड़ लगवाते 

विदेशी निवेश फिर इन 
बगीचों में भी मंगवाते 
बाकि इनमे जो रहते शेष 
वो तश्करी कर कमाते 

बातें आज जो होती हैं 
तब भी यूँ ही होती 
पर, पैसे पेड़ों पे उगते जो  
शायद खुशहाली होती....

Saturday, September 22, 2012

कमबख्त नौकरी, जीवन की एक मज़बूरी












ये ऊँची फंडू बातों में, कडवी तीखी सच्चाई 
मुख पर होती तारीफें, पीछे से खूब खिंचाई 

चापलूसी, चमचागिरी, कहीं हुस्न पे झुकाव 
अँधा भरोसा कहीं पर, कहीं हर बात में टकराव 

कहीं इर्ष्या, कहीं जलन, आपस में खिंचा-तानी 
राजनीति, कूटनीति, और साथ मिले बेईमानी 

जिक्र तनखा का हो, वो चुनावी लुभाते वादे
प्रमोसन में बरसों, इन्क्रीमेंट चंदों से आते 

ये रोज नये से टार्गेट, साहब की जी-हुजूरी 
कमबख्त नौकरी, जीवन की एक मज़बूरी


 Theme Suggested By: Mr. Rahul Mehta

Saturday, September 15, 2012

चाय से चाहत जुडी...

चाय से चाहत जुडी
कुछ को बस लगाव
कुछ के लिए नशा सा है
ना छुटे लाख उपाय 

कहीं अदरकी, कहीं इलाची 
कहीं खड़ी, कहीं कड़क 
लोकप्रियता इससे जुडी 
हर नुक्कड़, हर सड़क 

दिन के हर प्रहर का है 
इससे सीधा सा नाता 
सुबह सुबह हो बेड-टी
तो बिस्तर छूट पाता 

ऑफिस में महबूब सा 
चायवाले का इंतज़ार
कब आये, थोडा मूड बने 
हो थोड़ी गप-सप दो चार 

घंटो चलती मीटिंग्स हो
हो भाषण, ट्रेनिंग, सेमीनार 
टी ब्रेक ही बनता है हरदम 
सरदर्द का उपचार

वो इम्तिहान, वो सिलेबस
वो किताबी भारी रातें 
वो भागती घडी की सुई 
नींद की भीनी आहटें 

कि जागने से जुड़ा हो 
जब कभी खेल सारा 
तो ये ही एकमात्र पेय 
जो बनता है सहारा 

जोडियाँ जोड़नी हो 
हो रिश्तेदारी, व्यवहार 
चाय बनती है एक माध्यम 
या यूँ कहें इश्तेहार 

हो दोस्तों की महफ़िलें 
वो पहला प्यार, इज़हार 
इससे जुडी कई बरसातें 
वो लम्हा कोमल, यादगार 

इससे जुड़ा है जीवन
वो यादें अपरंपार 
वक़्त मिले लीजिये दो चुस्की 
करिये ख्यालों में दीदार 

चाय से चाहत जुडी....

Theme Suggested by: Ms. Meenakshi Kurseja

Sunday, August 19, 2012

दोस्त खुद ही के होकर देखिये...

आत्मीयता स्वयं से कर के देखिये
दोस्त खुद ही के होकर देखिये 

कि साथ भी मिलेगा, सहारा भी 
थोड़े मन के होइये, खुद को टटोलिये

आसान लगेगी ज़िन्दगी की कसौटियाँ
परिवर्तन होगा महसूस कर के देखिये 

दोस्त सच्चे मिलेंगे चंद ढूंढे पर 
खुद सा सच्चा कोई कहाँ, ये तो सोचिये 

दोस्त खुद ही के होकर देखिये 



The thought here of "friendship with self" is inspired and further carried forward from a reading on Jain Darshan and also is rooted in Bhagwad Gita. 

Monday, July 30, 2012

अभिनेता बहुत हुए, थोड़े नेता भी चुन लो

हे यमदेव ! विनम्र प्रार्थना हमरी ये सुन लो
अभिनेता बहुत हुए, अब थोड़े नेता भी चुन लो

मृत्यु इन्हें देने का एक अभियान चलाओ
पहले पहल सारे भ्रस्टाचारियों को बुलाओ
दुसरे चरण में दलबदलू-मौकापरस्त ले जाओ
तीसरे चरण में जातिवादीयों की हो बारी
अंत में जीवन-मुक्त करो, सब मजहबी-चोलाधारी
हो सकता है बढ़ जाए संख्या तुम्हारे डेरे में
उपाय एक ये भी है कुछ को दे दो बिमारी

एक सहायता तुम्हारी बस, अदभुत परिवर्तन लायेगी
न्यायालय बस न्याय करेंगे, पुलिस जन सुरक्षा में लग जायेगी ,
ना अनशन, ना विरोध होंगे, सरकारें कानून बनायेगी
बाकि जो बचें हैं निस्चर, उन्हें मेरी अगली प्रार्थना बताएगी

हे यमदेव ! विनम्र प्रार्थना हमरी ये सुन लो
अभिनेता बहुत हुए, अब थोड़े नेता भी चुन लो



Theme Suggested by: Ms. Ila Niyant Pandya Ma'am (Visiting Faculty, Faculty of Social Work, Maharaja Sayajrao University, Vadodara). Mrs. Pandya is a Life student, a teacher, guide, mentor and a superb friend. Also she has been the most regular reader of my creations. Writing  attempt on a theme by her was a pleasant experience n feel.     

Sunday, July 8, 2012

एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते हैं लोग ...


















कहते-कहते ही संभल जाते हैं लोग
पलक झपकते ही बदल जाते हैं लोग

कितना आसान है झूठ कहना-सुनना
पकडे जाने पे, सकपकाते हैं लोग

स्वार्थी ये दुनिया, रिश्ते-नाते समाज
अचानक ही अपनापन जताते हैं लोग

बेवकूफ पैदा ही नहीं होते अब जहाँ मैं
चालाकी खून में ही अब पाते हैं लोग

कौन सच्चा, कौन झूठा, समझे कोई कैसे
एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते  हैं लोग

होड़ लगी है सबमें कुछ कर दिखाने की
इसीमें रास्ता थोडा सा भटक जाते हैं लोग

एक खोज ही होगा मनुष्य को समझना
इन्ही कोशिशों में आते, चले जातें हैं लोग...

Wednesday, July 4, 2012

गिरते हौसलों को संभाला है बहुत...


















गिरते हौसलों को संभाला है बहुत
अंधेरों में भी कहीं उजाला है बहुत
रूठे ज़िन्दगी से, हालातों से अक्सर 
आंसुओं को बहने से, टाला है बहुत

रंगीली दुनिया  क्या खूब लोग हैं 
गोरे चेहरों में मन, काला है बहुत 
चाह कर भी ना समझ पाए इनको 
हर एक इन्सां यहाँ निराला है बहुत 

सपने देखते हैं, देखना जरुरी है 
इरादों में पर भरा अटाला है बहुत 
चुनौतियाँ आती रही, जाती रही 
सबसे लड़ने को खद को, ढाला है बहुत  

गिरते हौसलों को संभाला है बहुत...

Image Courtesy: Mr. Jinit Soni

Sunday, June 10, 2012

शौचालय या सोचालय... एक हास्य व्यंग

सोच शौचालयों में खिलती है
ना जाने कितने अविष्कार हुवे यहाँ से
मनुष्य की वैचारिक क्षमता
यहाँ शीर्ष स्थान पर होती है
ये वो शांति का केंद्र है
जहाँ मनुष्य खुद को खुद के करीब पाता है
और यही करीबी विचारों-चिन्तनों का रूप लेती है


शौचालयों के अदभुत प्रयोग होते हैं
कुछ महानुभाव यहाँ समाचार पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ लेते हैं
इस वक़्त वे देश और दुनिया पर गहन सोच करते हैं
कुछ बस ख्यालों में खोये से
ना जाने कितने दृश्य देख लेते हैं


नई पीढ़ी यहाँ से
दूर संचार के आश्चर्यजनक प्रयोग करती है
कोई लम्बी बातें, तो कोई चेटिंग
तो कोई फेसबुक दर्शन कर लेता है
जरा सोचिये यदि यहाँ से कोई करंट स्टेटस लिखे, तो क्या होगा ?


दफ्तरों में अक्सर यहाँ रौनक पाई जाती है
मीटिंग के बीच नया आईडिया भला कहाँ से सूझे
और हाँ जरुरी मिस्ड काल्स को भी देखना रहता है
कुछ बस चले आते हैं सजने-संवरने, विराम पाने


अभी खबर ये भी सुनी
देश के योजना भवन में लाखानी सौचालय बनाए गए
भाई ! क्यूँ ना हो, यहाँ से तो पुरे देश की योजनायें बनती है


हम तो बस यही कहेंगे
शौचालयों....., माफ़ कीजियेगा
सोचालयों की आपकी सोच जारी रहे:-)




Note: 
उपयुक्त कविता का विचार ब्लॉग मित्र श्री अमितजी के विचार से आया, शीर्षक और पूरी कविता उन्ही के विचारों का भाव लिए है.  गुस्ताखी माफ़!!!... उन्हें यहाँ पढ़ें...

Thursday, May 31, 2012

बड़े गिरगिटीया हैं हम...

बड़े गिरगिटीया हैं हम,
कितने रंग बदलते हैं... 
कमबख्त मौसम, माहोल,
सब फ़िज़ूल है इंसानी रंगों में... 

अभी कुछ पल पहले ही जो 
मुस्कुरा रहे थे 
अब आग उगल रहे हैं 
जोरो चिल्ला रहे हैं 



की दूजे ही पल शांत
ख्यालों में खोये से 
पलक झपकी नहीं की
की मन ही मन बडबडा रहे हैं 

तारीफ कर भी दी किसी की कहीं 
माहोल बदला, अपशब्द बरसा रहे हैं 
कभी कोसे खुद को, कभी औरों को  
बेचैन से हैं, थोड़े पगला रहे हैं 

मजाकिया मिजाज़ कहा जाता है 
पर हम तो मिजाजी बने जा रहे हैं 
रहस्य गहरा है इन इंसानी रंगों का 
सोचिये आप कितने रंग अपना रहे हैं 

बड़े गिरगिटीया हैं हम...

*गिरगिटीया- Chameleon types...

Saturday, May 19, 2012

चाहने से क्या होता है...















दिल चाहता है
पर चाहने से क्या होता है ?
अकेलापन कोई आदत नहीं होती 
पर हर मोड़ अकेला होता है...... 

हम कह भी दें की मौसम है आशिकाना 
पर भला कहने से, कहाँ होता है ?
ये इश्क एक बीमारी, हर कोई है रोगी 
इन रोगों का कहाँ इलाज़ होता है ?

कहीं हंसी है इसमें, तो कहीं नमी सी है 
कुछ कहते है फैसला, तकदीरों से होता है
 
दिल चाहता है
पर चाहने से क्या होता है...?




Wednesday, May 9, 2012

युवादृष्टि मासिक पत्रिका में प्रकाशित मेरी दो कविताएँ:-)

युवादृष्टि मासिक पत्रिका में प्रकाशित मेरी दो कविताएँ:-)




Saturday, April 21, 2012

कुछ इस तरह से...

कुछ इस तरह से तुम ज़िन्दगी में छाई हो
मैं ठण्ड हूँ गर तो, तुम मेरी रजाई हो ...
कुछ इस तरह से...


मैं दूध का पतीला, पूरा भरा हूवा सा
तुम उसपे जमी हुई, गाढ़ी सी मलाई हो...
कुछ इस तरह से...


मैं बुझा हूवा सा जर्जरित सा लालटेन
तुम ही हो बाती, तुम ही दियासलाई हो...
कुछ इस तरह से... 
 
मैं भोजनालयों का जला हुआ सा बर्तन
तुम उसपे जमी हुई, सख्त सी चिकनाई हो...
कुछ इस तरह से... 


मैं सरकारी दफ्तरों का पुराना सा टेबल 
तुम फाइल वजनदार, कभी अंडर-टेबल कमाई हो...
कुछ इस तरह से...  

मैं अनदेखा - अनपढ़ा सा फसबूकिया पेज 
हजारों फोलोवर्स वाली तुम,सुपर एक्टिव प्रोफाइल हो...
कुछ इस तरह से...  

मैं समझा हूवा सा गंवार, नासमझ
तुम अनसुलझी गुत्थी, विकट कठिनाई हो...
कुछ इस तरह से...

Thursday, April 5, 2012

A Flashback...


A Flashback
comes in;
Unplanned, unscreened...
Toughest of the moments
with a lengthy Pause...
Attempts, reattempts to 
Forward them, all in vain... 

The Life-player had got stuck up
in between...
as if without power, energy
and a word called mercy....

All dark n blank around
with all buttons inoperative
A thought floating to get a chance to rewind
to re-live a few moments,
in a better manner;
a happier way
Wish I could have some more time...

Alas! Words n thoughts lack expression now...  



Friday, March 23, 2012

ना खुद सोये, ना सपनों को सोने दिया..














ना खुद सोये, ना सपनों को सोने दिया 
कुछ कर दिया, बाकि बस होने दिया..... 

मंजिलें इंतज़ार करती होंगी हमारा 
इस सोच ने चलाया, बस बढ़ने दिया 

अनजान रास्ते नुकीले, टेढ़े मेढ़े से 
दृढ हौसलों ने हरदम, बस चलने दिया 

रुके भी, थके भी, अलसाए थोडा बहुत 
ख्याल उलझे कभी तो, बस उलझने दिया 

की जागना जरुरी है, जगाने के लिए 
यही तो कहना था हमे, बस कह दिया  

ना खुद सोये, ना सपनों को सोने दिया 

Thursday, March 15, 2012

पुनरावर्तन...A Photo Poetry

फसबूक पर एक NGO के पेज पे ये तस्वीर मिली, जिसे एक मित्र ने LIKE किया और ये मुझे द्रश्यमान हुई....सन्देश बहुत तगड़ा था 
I salute this mother, she knows the value of education even though she lives below poverty line! Support people who live with hopes to educate & achieve big in this world!  


बस फिर कुछ मैंने भी लिख दिया, आप भी पढ़िए....और हाँ अपनी संतानों को पढ़िये जरूर... हो सके तो किसी को पढने में यथासंभव मदद भी कीजिये....



देखी ना मैंने कभी, 
किताबों की हलचल
ना बस्ते, ना घंटियाँ
ना परीक्षा-परिणामों की कुतूहल

संघर्ष में ही बीता जीवन
कठिनाइयाँ रही हर पल, हरदम
कभी भूखे सोये, कभी थोडा भोजन
इन्ही रास्तों पे कटी जवानी व् बचपन

हालत कुछ आज भी वैसे ही है
पर नहीं होने दूँगी मेरे जैसा 'पुनरावर्तन'
पढ़ाऊगी तुझे मैं
जीते-जी पुरे दम-ख़म
चाहे करना पढ़े लाख श्रम
ना पीछे हटूंगी ये मेरा दृढ मन

शिक्षित तू होगी
होगा स्वप्न पूरा
की हमारा भी होगा
ये जीवन कभी मधुबन....



पहली बार तश्वीर देख कर कविता लिखने का प्रयोग किया है...

Saturday, March 3, 2012

वो कुछ पल जो तेरे साथ बीते हैं...

वो कुछ पल जो तेरे साथ बीते हैं
आज भी बस हम उन्ही में जीते हैं
ख्यालों में कितनी रहती है अमीरी 
कलम पीने लगी, जाम लिखते हैं 

शरारतें, वो मस्ती, रूठना - मनाना
बेमतलब थोड़े फूले- फूले से रहते हैं   
धडकनें बढ़ी, कभी सांसें थम ही गई 
अदाओं में तेरी,  तीखे सलीके हैं 

खामोशियों में अक्सर होती बातें 
बिना कहे ही, काफी कुछ सुनते हैं 
होठ जब कभी तेरे, लेते हैं अंगड़ाई 
नज़रें गडी सी उनपर, बेचैन रहते हैं 

वो कुछ पल जो तेरे साथ बीते हैं
आज भी बस हम उन्ही में जीते हैं...

Image Courtesy: Ms.Shambhavi Upadhyay

Saturday, February 18, 2012

अनजाना ही अच्छा हूँ...














मुझे जान कर करोगे क्या 
अनजाना ही अच्छा हूँ 
भीड़ में खोया खोया सा 
बेगाना ही अच्छा हूँ

भला, नाम में  क्या रखा है? 
इस प्रकृति का ही बच्चा हूँ
समझा हुआ सा नासमझ 
थोडा पगला सा ही अच्छा हूँ 

कि प्यार है मुझमे भी 
भक्त सौन्दर्य का मैं सच्चा हूँ
यूँ संबंधों में ना जक्ड़ो में 
आज़ाद दीवाना अच्छा हूँ 

कभी खुश हूँ, कभी व्याकुल 
भावुक हूँ, थोडा सा बच्चा हूँ 
जिंदगी सफ़र, बस चलता रहा 
मुसाफिर मस्ताना अच्छा हूँ  

Thursday, February 16, 2012

नजारा बदलेगा


नज़र बदली, नज़रिये बदले,  
नजारा भी बदलेगा 
दिन आज नहीं तो कल, 
हमारा- आपका भी बदलेगा 

दुःख-पीडा, परेशानी-संकट 
सारा ताल जायेगा 
बुद्धि-श्रम, दृढ हौसलों के आगे, 
समय पलट ही जायेगा 

प्रेम-धैर्य, विश्वास-लगन से
मौसम पलटी खायेगा 
अरमानों के बादल बरसेंगे,
सुख ही सुख छा जायेगा 

अदा बदलेगी, अंदाज़ बदलेगा, 
लोगो का हमारे प्रति मिजाज़ बदलेगा  
आज जो कोई रखता है दूरी, 
कल आस पास टहलेगा.

नज़र बदली, नज़रिये बदले, नजारा बदलेगा ...

Sunday, February 12, 2012

नाम तेरा पानी पे लिखा






नाम तेरा पानी पे लिखा 
न जाने कहाँ ओझिल वो हूवा 
फिर कोशिश कि बालू पर 
लहरें जो आई, बह वो गया 

सोचा पत्थर पर लिख डालूँ
न मिटे कभी, न हो सफा 
पर एक और पत्थर जो टकराया उसे 
टुकड़ों में वो तो बिखर गया 

हारकर उसे मेरे दिल पे लिखा 

अब इससे बेहतर जगह कहाँ 
हर पल में धडकता रहता है
न रोक सकूँ; न कर पाऊं जुदा

Saturday, February 4, 2012

सर्द-जुकाम....An Ode to Cold n Cough





ठण्ड का प्रकोप कुछ इस तरह से बढ़ रहा
हर किसी का कमबख्त नाक है बह रहा 
जुकाम ने धीरे- धीरे रफ़्तार बढाई है 
अ आं....छी, आं....छी, करते सामत आई है 


शुरू  शुरू में बहता था बस 
अब वन-वे ट्राफिक बंध हूवा 
कफ का जमावड़ा सीनों में 
बुलंद हूवा, प्रचंड हूवा 


डॉक्टर बने लेकर खुद ही 
बाजारी चंद दवाएं 
कमबख्त हालत और बिगड़ी 
गला भी अब बंध हूवा 


की सांसें ले रहे मूह से 
गाढ़ा पीला कफ बनता है 
हर रोज किलो- दो किलो 
प्रोडकशन निकलता है 


की घरेलु इलाज़ भी आजमाए 
पिये अदरकी चाय व् काढ़े 
गला खोलने को न जाने
किये कितने गरारे 


तभी किसी ने कहा 
चादर ओढ़ भाप भी ले लो 
हमने कहा भाई बस जिन्दा हैं 
चाहो तो जान ही ले लो 


रोजाना मानव ये बदतमीज़ बीमारी 
झेल रहा, बस सह रहा 
हर  किसी को सर्द-जुकाम लगी है; 
हर किसी का कमबख्त नाक है बह रहा....  



A complete different theme suggested by : Ms.Meghna Bhatt
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