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Thursday, December 29, 2011

मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...
















मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं
उम्र गुज़री, अब भी मगर 
थोडा नादान हूँ, 
विध्यार्थी हूँ मैं...... 

कभी क्रोधी, कभी लोभी
कभी व्यसनी, कभी भोगी 
थोडा आसक्त हूँ  
क्षमानार्थी हूँ मैं
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

साथी हूँ, कभी हमसफ़र 
सब जान कर भी बेखबर 
थोडा भटका हुआ,
शरणार्थी हूँ मैं 
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

जीवन एक परीक्षा 
हर क्षण एक प्रस्नपत्र
ना तैयारी कोई मगर   
परीक्षार्थी हूँ मैं 
विध्यार्थी हूँ मैं...... 
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

Saturday, December 17, 2011

पहला प्यार...

प्रस्तुत कविता का विषय और विचार मेरे प्रिय मित्र कमाल त्रिवेदी का है....प्यार हर एक के जीवन में महत्व रखता है...कई बार इसी चक्कर में कुछ खयाली हादसे भी हो जाते हैं...वक़्त के साथ काफी बदलाव आते हैं...पर इन सब के बीच ज़िन्दगी में पहले प्यार का एक बेनमून रोमांच होता है और कितनी भी उम्र गुज़र जाए, चाहे आप कितना भी और प्यार पा लें पर कहीं न कहीं पहला प्यार याद रहता है हरदम,,,,आशा रखता हूँ प्रस्तुति आपको आपके पहले प्यार की याद जरुर दिलाएगी....और हाँ यदि अभी तक आपको अनुभव नहीं हुवा तो हम तो इतना ही कहेंगे, पहला ही आखिरी हो ऐसा चयन करें..:-) 


वो पहला प्यार 
वो अजब सा आकर्षण
वो नज़रों का शिथिल हो जाना 
वो चुम्बकीय आलिंगन 

क्या रोमांच था 
उन मीठी सी बातों में 
छुप-छुप कर हुई चंद मुलाकातों में 
आँखें बतियाती थी जब 
एक पागलपन सा था अनकहा 

सोते और जागते सपनों में 
अधूरे संदेशों में 
खामोश सी आहटों में 
कि जैसे ही दोस्ती की दीवाल कूद गिरे 
प्यार के मैदान में 
कमबख्त, 
चोट आज भी महसूस होती है 
ये ना भरने वाला घाव है 
दवा-मरहम सब बे-असर है 

पंखुड़ियों पे तेरी, 
भ्रमर सा मेरा चुम्बन 
वो हवाओं की नर्मजोशी, 
वो जिंदगी का आलिंगन 
वो शब्द, वो लम्हे, वो साथ 
एक उर्जा थी वक़्त में भी 
हर गीत, ग़ज़ल, नज़्म 
अपनी सी लगती थी

वक़्त के साथ, सब बिखरा 
प्यार मिला शायद और ज्यादा 
पर- मगर - लेकिन 
आज भी कहीं ना कहीं
वो खुशबू कायम है 
एक अधुरा ख्याल 
जीवित है 
उस अनूठे आकर्षण का 
उस एहसास का 
ज़िन्दगी बंदगी थी जब
उस पहले प्यार का......  

A Theme by: Mr.Kamaal Trivedi


Sunday, December 11, 2011

संघर्ष ...

संघर्ष ज़िन्दगी से, 
कुछ ऐसे जुड़े हैं 
दो डग आगे बढे नहीं,
चार पीछे पड़े हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

गाँव छूटे, शहर भी,
वो गलियां, प्यारे लोग भी 
पर ये साथ रहे सदा, 
परछाई से बढें हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

उम्र इनकी ज्यादा हमसे,  
शायद विरासत में मिले हैं 
आदत सी है इनकी अब तो, 
मानों ज़िन्दगी में जड़े हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

पर आखिरी वो ज़िन्दगी का 
संघर्ष जो गहरा देखा था,  
तबसे डरे-डरे से हैं 
सहमे से पड़े हैं
संघर्ष ज़िन्दगी से...

क्या दुश्मनी थी हमसे, 
क्या बिगाड़ा था इनका 
कमबख्त क्रूर से हमारे ही, 
पीछे क्यूँ पड़े हैं ?
संघर्ष ज़िन्दगी से... 

Monday, December 5, 2011

ख़त्म होते जंगल....

ये ऊँची-ऊँची इमारतें, 
ये ईंट-पत्थर की दुनिया, दिखावा-आडम्बर
फैलता हूवा मानवीय प्रकोप और 
ख़त्म होते जंगल....

वो वहां, एक बड़ा सा वाहन
भारी लदा जा रहा है 

शीशम रो रहा है 
बरगद कराह रहा है 
बबुल कहीं कोने में सिकुड़ रहा है 
चन्दन सुगध भुला, छटपटा रहा है 

इकठ्ठे हुवे ये आज
सर कटे, मुर्छित से 
अलग-अलग जंगलों से 
इनके कुछ बचे साथियों में 
मातम सा छाया है 
सहमे हुवे से हैं, 
अपने भविष्य के ख्याल से  

एक दुनिया बसती थी इन सब पर 
पंछियों के घोंसले, 
उनमे नन्हे बच्चे 
कितने ही जीव-जंतुओं का डेरा था 
कई सारे पशु भी आश्रित थे 

कमबख्त कोस रहे है आज 
उस एहसान फरामोश को, मनुष्य को 
बद-दुवाएं दे रहे हैं 
वह मनुष्य, की जो इन्हें बस,
काटता ही जा रहा है 
समृधि के नशे में 


भूल गया है 
की उसके जीने के लिए 
इनका जीना जरुरी है 
सांस लेनी हो तो 
हवा का होना जरुरी है  


Theme suggested by: Kamaljit Sindha 


Thursday, December 1, 2011

बेपरवाह...









परवाह 
रहती है हरदम
ना जाने
कितने ही लोगों की 
रिश्तों की, नातों की 
और इन सबसे जुडी
छोटी-छोटी चीजों की 

व्यस्तता हरदम रहती है 
दिमाग दौड़ता रहता है 
और साथ हम भी 
इसी परवाह के पीछे 

क्यूंकि
लापरवाह कहलाना 
हमें चुभता है 
आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है 

पर आज एक बार बस 
बेपरवाह 
हो कर देखना है 
हर चिंता से, हर फिक्र से परे 
न मोबाइल की घंटी, न सन्देश  
न इन्टरनेट, न ई-मेल

बस अपनी ही मस्ती में 
बस अपनी ही दुनिया में
करें वो सब
जो करना चाहें 
निश्चिंत 
कौन क्या कैसे कर रहा है
उससे हमें 
कोई फर्क ना पड़े 
ना कोई समस्या हो
ना कोई उदेड-बुन 
ना ही समय-सीमा 
ना कोई बंधन

बस हवाओं को महसूस करें
आसमानों को छु लें 
पहाड़ो को चूम ले
नदियों में बह ले 
पछियों सा चहक़ ले, उड़ लें 
प्रकृति से  
एक अभूतपूर्व आलिंगन हो 
अलमस्त, अलबेले व् अनोखे अंदाज़ में

पर शायद 
ये ज्यादा देर संभव नहीं 
फिर वही परवाह 
खीच लाएगी आपको 
अपने साधारण जहाँ में 
जीवन में... 

क्यूंकि परवाह लापरवाह नहीं
बेपरवाह नहीं......


Theme by: Ms.Pratiksha Purohit

Image Courtesy: Google 


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