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Friday, October 28, 2011

झूठा सच...


सच, 
आज कितना, 
झूठा हो गया है

स्वार्थ के बहानों में
गिरे हुवे से ईमानों में

प्रतियोगिता के नशे में 
हर दफ्तर में 
हर ठिकानों में

ढोंगी से रवैयों में 
समझे-जाने हुए,
अनजानों में 

उन बेशरम से 
रहीशों से 
उन्हीके 
घमंडी अरमानों में 

दर्द छुपा बस रह जाता 
गरीब-निर्धन के 
मकानों में  

सच, 
आज कितना, 
झूठा हो गया है

स्वार्थ के बहानों में....

14 comments:

Anil Avtaar said...

Really very nice written Prakash Ji.. Jagmagate rahiye.. Bahut Sundar..

संगीता पुरी said...

सच्‍ची अभिव्‍यक्ति !!

Vishwa Vyas said...

Good One Boss!!!! Very True!!!

dheerendra said...

बहुत अच्छी प्रस्तुती...सच आज कितना है...

Rashmi Fadnis said...

Truly said..nice one.

अनुपमा पाठक said...

कटु सत्य!

kamaalnivato said...

Bahot hi badhiya tarah se ek juth ke pravah ka chitran sidhe sade shabdo mein vyakt kar diya...

हरकीरत ' हीर' said...

दर्द छुपा रह जाता है
बस गरीब निर्धन के मकानों में .....

सही कहा .....!!

प्रेम सरोवर said...

आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद। ।

Ruchi Jain said...

very nice write up....

रश्मि प्रभा... said...

सच तो हमेशा झूठ के कटघरे में रहा है .... जल्दी कोई अच्छा वकील मिलता ही नहीं

Kailash C Sharma said...

बहुत सटीक कटु सत्य...सुन्दर अभिव्यक्ति..

Nidhi Shendurnikar said...

it is true that the boundaries between truth and falsehood are getting blurred in today's modern world

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...

आज की सबसे बड़ी हकीकत से रूबरू ....
बहुत अच्छी रचना
बधाई हो !

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