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Friday, May 6, 2011

बिखरे तिनखे...

तिनखे हम भी जुटाते थे
एक घोंसला बनाने को 
कुछ नुकीले से, कुछ कोमल से 
कुछ टेढ़े-मेढ़े, 
तो कुछ बेनमून
काफी वक़्त लगता था 
उन्हें ढूँढने में, जुटानें में

एक सपना जुड़ा था उन से 
खुशनुमा जीवन का, घर-संसार का 

पर आज तिनखे बिखर चुकें हैं 
अब जब कि घोंसला बनानेवाला ना रहा 
सच कहूँ, 
उनका नुकीलापन अब चुभता है, 
डसता है  

अब ना आरज़ू रही वो,
ना हौंसला रहा 
तिनखे जुटाने को 
वो सपनो का घोंसला बनाने को...

16 comments:

Nidhi Shendurnikar said...

excellent ....tinka is the metaphor of hope here. it symbolizes the hope that we aspire to put in achieving things in our life.

Vishwa said...

kya baat hai!

kamaalnivato said...

bhai khubaj sundar rachna chhe, mein aa kavita vanchi, samaji ane anubhavi. Love you yaar....

kamaalnivato said...

Bhai, apde bhega karishu badha tanakhala ane banavishu malo...." Sangathe sukh shodhiye, rachiye ek hufalo malo".

princy said...

very nice creation...prakash...

ila pandya said...

GHOSLA BANANEVALA NAHI RAHA......................
LEKIN UNKEE ABHILASHAE AUR UNKE SAPNE TO SADA AAPSE JUDE HI HAI................................
AAPKI DHADKANOSE................................
AAP UNSE ISS TARAH JUDE HAI KI...
HAR SUBAH VO AAPKO NAYEE ASHAE AUR AHISH PRADAN KARTE HAI;JIS SE YAHI TINKO KI KOMALTA KO AAP PAHECHAN SAKE.....!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

संजय भास्कर said...

तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत खूब!

----
कल 29/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर रचना.....
सादर बधाई...

Navin C. Chaturvedi said...

वाह बहुत सुंदर कविता,
सिर्फ 'घोसला बनाने वाला न रहा' वाले हिस्से में थोड़ा [?] जैसा कुछ दिखा, हो सकता है मेरे समझने में कमी हो।
बहुत बहुत बधाई इस सुंदर प्रस्तुति के लिए प्रकाश भाई

***Punam*** said...

sundar prastuti ke liye badhyee...!!

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

तिनखे हम भी जुटाते थे
एक घोंसला बनाने को
कुछ नुकीले से, कुछ कोमल से
कुछ टेढ़े-मेढ़े,
तो कुछ बेनमून
काफी वक़्त लगता था
उन्हें ढूँढने में, जुटानें में
बेहद सुन्दर प्रस्तुति...शुभ कामनायें !!

dheerendra said...

प्रकाश जी,..
बहुत सुंदर सटीक रचना,...बेहतरीन,..
मेरे पोस्ट'शब्द'में आपका इंतजार है,...

ASHOK BIRLA said...

संघर्ष की धरा पर एक जिवंत कोशिश को बाया करता काव्य ....और भावनाओ से भरे मन से फूटा पड़ा जो दर्द ....वो एक प्रभावी कलम को पाकर सार्थक सा लग रहा है !!

life on new track said...

superb

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