THEMES

LIFE (52) LOVE (28) IRONY (25) INSPIRATIONAL (9) FRIENDSHIP (7) NATURE (3)

Thursday, December 29, 2011

मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...
















मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं
उम्र गुज़री, अब भी मगर 
थोडा नादान हूँ, 
विध्यार्थी हूँ मैं...... 

कभी क्रोधी, कभी लोभी
कभी व्यसनी, कभी भोगी 
थोडा आसक्त हूँ  
क्षमानार्थी हूँ मैं
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

साथी हूँ, कभी हमसफ़र 
सब जान कर भी बेखबर 
थोडा भटका हुआ,
शरणार्थी हूँ मैं 
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

जीवन एक परीक्षा 
हर क्षण एक प्रस्नपत्र
ना तैयारी कोई मगर   
परीक्षार्थी हूँ मैं 
विध्यार्थी हूँ मैं...... 
मनुष्य हूँ, स्वार्थी हूँ मैं...

Saturday, December 17, 2011

पहला प्यार...

प्रस्तुत कविता का विषय और विचार मेरे प्रिय मित्र कमाल त्रिवेदी का है....प्यार हर एक के जीवन में महत्व रखता है...कई बार इसी चक्कर में कुछ खयाली हादसे भी हो जाते हैं...वक़्त के साथ काफी बदलाव आते हैं...पर इन सब के बीच ज़िन्दगी में पहले प्यार का एक बेनमून रोमांच होता है और कितनी भी उम्र गुज़र जाए, चाहे आप कितना भी और प्यार पा लें पर कहीं न कहीं पहला प्यार याद रहता है हरदम,,,,आशा रखता हूँ प्रस्तुति आपको आपके पहले प्यार की याद जरुर दिलाएगी....और हाँ यदि अभी तक आपको अनुभव नहीं हुवा तो हम तो इतना ही कहेंगे, पहला ही आखिरी हो ऐसा चयन करें..:-) 


वो पहला प्यार 
वो अजब सा आकर्षण
वो नज़रों का शिथिल हो जाना 
वो चुम्बकीय आलिंगन 

क्या रोमांच था 
उन मीठी सी बातों में 
छुप-छुप कर हुई चंद मुलाकातों में 
आँखें बतियाती थी जब 
एक पागलपन सा था अनकहा 

सोते और जागते सपनों में 
अधूरे संदेशों में 
खामोश सी आहटों में 
कि जैसे ही दोस्ती की दीवाल कूद गिरे 
प्यार के मैदान में 
कमबख्त, 
चोट आज भी महसूस होती है 
ये ना भरने वाला घाव है 
दवा-मरहम सब बे-असर है 

पंखुड़ियों पे तेरी, 
भ्रमर सा मेरा चुम्बन 
वो हवाओं की नर्मजोशी, 
वो जिंदगी का आलिंगन 
वो शब्द, वो लम्हे, वो साथ 
एक उर्जा थी वक़्त में भी 
हर गीत, ग़ज़ल, नज़्म 
अपनी सी लगती थी

वक़्त के साथ, सब बिखरा 
प्यार मिला शायद और ज्यादा 
पर- मगर - लेकिन 
आज भी कहीं ना कहीं
वो खुशबू कायम है 
एक अधुरा ख्याल 
जीवित है 
उस अनूठे आकर्षण का 
उस एहसास का 
ज़िन्दगी बंदगी थी जब
उस पहले प्यार का......  

A Theme by: Mr.Kamaal Trivedi


Sunday, December 11, 2011

संघर्ष ...

संघर्ष ज़िन्दगी से, 
कुछ ऐसे जुड़े हैं 
दो डग आगे बढे नहीं,
चार पीछे पड़े हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

गाँव छूटे, शहर भी,
वो गलियां, प्यारे लोग भी 
पर ये साथ रहे सदा, 
परछाई से बढें हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

उम्र इनकी ज्यादा हमसे,  
शायद विरासत में मिले हैं 
आदत सी है इनकी अब तो, 
मानों ज़िन्दगी में जड़े हैं 
संघर्ष ज़िन्दगी से...

पर आखिरी वो ज़िन्दगी का 
संघर्ष जो गहरा देखा था,  
तबसे डरे-डरे से हैं 
सहमे से पड़े हैं
संघर्ष ज़िन्दगी से...

क्या दुश्मनी थी हमसे, 
क्या बिगाड़ा था इनका 
कमबख्त क्रूर से हमारे ही, 
पीछे क्यूँ पड़े हैं ?
संघर्ष ज़िन्दगी से... 

Monday, December 5, 2011

ख़त्म होते जंगल....

ये ऊँची-ऊँची इमारतें, 
ये ईंट-पत्थर की दुनिया, दिखावा-आडम्बर
फैलता हूवा मानवीय प्रकोप और 
ख़त्म होते जंगल....

वो वहां, एक बड़ा सा वाहन
भारी लदा जा रहा है 

शीशम रो रहा है 
बरगद कराह रहा है 
बबुल कहीं कोने में सिकुड़ रहा है 
चन्दन सुगध भुला, छटपटा रहा है 

इकठ्ठे हुवे ये आज
सर कटे, मुर्छित से 
अलग-अलग जंगलों से 
इनके कुछ बचे साथियों में 
मातम सा छाया है 
सहमे हुवे से हैं, 
अपने भविष्य के ख्याल से  

एक दुनिया बसती थी इन सब पर 
पंछियों के घोंसले, 
उनमे नन्हे बच्चे 
कितने ही जीव-जंतुओं का डेरा था 
कई सारे पशु भी आश्रित थे 

कमबख्त कोस रहे है आज 
उस एहसान फरामोश को, मनुष्य को 
बद-दुवाएं दे रहे हैं 
वह मनुष्य, की जो इन्हें बस,
काटता ही जा रहा है 
समृधि के नशे में 


भूल गया है 
की उसके जीने के लिए 
इनका जीना जरुरी है 
सांस लेनी हो तो 
हवा का होना जरुरी है  


Theme suggested by: Kamaljit Sindha 


Thursday, December 1, 2011

बेपरवाह...









परवाह 
रहती है हरदम
ना जाने
कितने ही लोगों की 
रिश्तों की, नातों की 
और इन सबसे जुडी
छोटी-छोटी चीजों की 

व्यस्तता हरदम रहती है 
दिमाग दौड़ता रहता है 
और साथ हम भी 
इसी परवाह के पीछे 

क्यूंकि
लापरवाह कहलाना 
हमें चुभता है 
आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है 

पर आज एक बार बस 
बेपरवाह 
हो कर देखना है 
हर चिंता से, हर फिक्र से परे 
न मोबाइल की घंटी, न सन्देश  
न इन्टरनेट, न ई-मेल

बस अपनी ही मस्ती में 
बस अपनी ही दुनिया में
करें वो सब
जो करना चाहें 
निश्चिंत 
कौन क्या कैसे कर रहा है
उससे हमें 
कोई फर्क ना पड़े 
ना कोई समस्या हो
ना कोई उदेड-बुन 
ना ही समय-सीमा 
ना कोई बंधन

बस हवाओं को महसूस करें
आसमानों को छु लें 
पहाड़ो को चूम ले
नदियों में बह ले 
पछियों सा चहक़ ले, उड़ लें 
प्रकृति से  
एक अभूतपूर्व आलिंगन हो 
अलमस्त, अलबेले व् अनोखे अंदाज़ में

पर शायद 
ये ज्यादा देर संभव नहीं 
फिर वही परवाह 
खीच लाएगी आपको 
अपने साधारण जहाँ में 
जीवन में... 

क्यूंकि परवाह लापरवाह नहीं
बेपरवाह नहीं......


Theme by: Ms.Pratiksha Purohit

Image Courtesy: Google 


Saturday, November 26, 2011

मजदूर का आत्म-चित्रण (Portrait of a Day Wage Earner)

इस कविता का विषय एवं विचार ब्लॉग मित्र ज्योति मिश्रा जी से मिला , और अगर ये भाव आपको पसंद आते हैं तो उसका पूरा श्रेय उनका भी होगा. 


कविता की शैली गुलज़ार साहब की एक नज्मों की किताब से प्रेरित है "पुखराज", जिसमे उन्होंने पोर्ट्रेट प्रस्तुत किये हैं , अब ये अलग सा विषय और विचार आपके सन्मुख प्रस्तुत है ....


दिनभर मेहनत करता हूँ 
रक्त-पसीना बहाता हूँ 
शाम हुए तो जीने को 
चंद रुपये ही बस पाता हूँ 

हर सुबह चुनौती रहती है 
एक काम नया पाने की 
किसी ठेकेदार के चुनने की
किसी सेठ के बुलाने की 

घर मेरा चलता फिरता 
बीवी और साथ में बच्चे हैं 
जिस जगह जहाँ भी काम मिला 
डेरा डाल रह लेते हैं 

दिन भर वे भी साथ मेरे 
मेहनत मजदूरी करते हैं 
तब जाकर शाम निकलती है 
रास्तों पर रात सो लेते हैं 

उन चंद रुपयों से बस 
उस दिन का गुज़ारा होता है 
आटा-चावल, तेल-तरकारी 
उस दिन ख़रीदे बनता है 

कभी-कभी जब काम नहीं 
बस पानी पीकर सो जाते हैं 
बच्चे भूखे रोते-चिल्लाते 
हम आंसू में रक्त बहाते हैं

ज़िन्दगी सपने मेरे भी है 
अक्सर देखा करता हूँ 
घर अपना हो, बच्चे पढ़ लें 
ऐसा सोचा करता हूँ 

फिर एक सुबह जब होती है 
डरा-डरा सा रहता हूँ 
आज भी काम मिलेगा मुझको
इस आस में जिंदा रहता हूँ......


Theme and Image Suggestion by: Ms.Jyoti Mishra

Wednesday, November 23, 2011

Inspired We are...














Inspired we are of People around

Few with rare talents in them 
Exceptional, Abound !

One for whom feelings we have
Heartful, Profound

The lady who gave us birth, Mother
Soulful, Unbound !

Life battle who fought for us, Father 
Savior, Rebound !

Renowned one in profession
A Success, Turnaround !

Struggle of one with inception 
Hardships, Surround !

A Never Give Up Attitude 
Consistent, Unground !

Inspired we are of People around !!!


Friday, November 18, 2011

'अकेला पंछी'

'अकेला पंछी'
वक़्त की आँधियों में,
तूफानों में,
बिछुड़ चूका है, 
अपने साथियों से
अपनी जमीं से, 
आसमां से 

एक वक्त था
बड़ा चहका करता था 
अपनी दुनिया में
शायद घमंड भी था उसे 
अपने साथियों के होने का 
हर वक्त बस उड़ना चाहता था 
पंख फडफड़ाते- लहराते रहता था 
नयी दिशाओं में, 
उनके साथ

उन आंधी-तूफानों में 
क्या-क्या नहीं खोया उसने 
अब दूर पहुँच चूका है 
एक नयी जमीं में 
नए आसमां में  
दुनिया बदली-बदली सी है 
लोग कुछ अलग से है

बेहद अकेला महसूस करता है खुद को 
तन्हा, बेचैन 
कमबख्त, कोसता है उन तूफानों को 
जिन्होंने ज़िन्दगी यूँ की 

खुद को नए माहोल में,
नई हवाओं में,
ढालने का प्रयास करता 
सोचता है 
काश! कि वो प्रलय से तूफ़ान ना आते ?
काश! सबकुछ सकुशल होता ?

Wednesday, November 16, 2011

गर्भावस्था: एक Filmy अनुभव

अभी हाल ही में एक नजदीकी पारिवारिक सदस्य के साथ अस्पताल में ये उपयुक्त ख्याल उन्हें हंसाने का प्रयास करते हुवे आया, (Pregnancy is like a FILM, It has everything....Love, Emotions, Pain, Climax, Drama, and finally a Happy Ending with the birth...
उनकी तबियत किन्ही कारणोंवश थोड़ी बिगड़ गई थी और काफी चिंतातुर थी, और परिवार के किसी भी सदस्य से इस बात का जिक्र नहीं किया गया था....... सच-मुच, उनका इस विचार से समर्थन और सब भूल कर उनके चेहरे पे आई मुस्कान ने विचार को शायद सफल कर दिया.  

अब ये थोडा अलग सा ख्याल, एक अलग से तरीके से आपके सामने प्रस्तुत है....



ये ज़िन्दगी की फिल्म है 
इसमें लव स्टोरी है 
या यूँ भी कहते बनता है 
ये लव स्टोरी का परिणाम है 

इमोशन है 
भावनाओं से ओतप्रोत,
अरमानों और आकांक्षाओं की लड़ियाँ भी है  
एक नए साथ की कल्पना 
नए वंश का विचार है 

दर्द है 
ऐसा की कुछ भी सहन कर लेने की 
क्षमता देता है, 
वो हिम्मत जो सिर्फ एक माँ ही जुटा सकती है 

कलाइमेक्स आता है  
बिगडती तबीयतों में  
सब कुछ अचानक,
भयजनक हो जाता है 
एक छुपा सा डर 
कहीं ना कहीं व्यक्त होता है 

ड्रामा 
की जब हम प्रयास करते हैं 
सब कुछ छुपाने का
जिक्र ज्यादा ना करने का 
चिंताओं से बचने के लिए 

और असहा दर्द सहने के बाद

हैप्पी एंडिंग - एक सुखद अंत 
की जब जन्म होता है 
नन्हे फ़रिश्ते का

ये आम जीवन की फिल्म है 
इसमें अभिनय नहीं, यथार्थ है 
इसिलए अनिश्चित है, रोचक है 

झांकिए अपने जीवन में
ढूँढिये अपनी फिल्म ऐसी कोई,
और यादों में देखने का प्रयास कीजिये
कहीं ऐसी तो ना थी ?

Wednesday, November 9, 2011

Interpreting LOVE....

 
INTERPRETING LOVE

A divine creation, a beautiful expression,

Love is an array of emotions.


A feeling that brings souls together,

Love binds relations forever.

Friendship to some, to some it is life,

Love is an essence to survive.


Faith, sacrifice, responsibility interwoven,

Love is enchanting like Heaven.

True is the virtue, though very rare,

Love personifies warmth and care.

Love is like the sun, shining so bright,

Leaving some room for small fights.

Love is like the wind - strong and growing,

Seems like a river, forever flowing.

Love is like a song, brimming with melody,

Solves all problems, comes in handy.

Spreading its wings, love isn’t bound,

Varying in form – love is all around.


So, surrender yourself to the charms of love,

Life is indeed magical in the arms of love.



By: Ms. Nidhi Shendurnikar Tere

This one is from diary of a very good friend,  scholar, writer and now a poet too... This was written by her way back in 2007 in participation to a competition.  Currently she is pursuing her Ph.D from MSU, Vadodara

Enjoy her interpretations on LOVE.... 




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