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Thursday, April 15, 2010

Virtual जीवन...









जबसे आया है Computer जीवन में
Password protected हूवा जीवन है
कि Folder अलग है, File अलग है 
मिया-बीवी की Networking Profile अलग है

कि Chatting पे हँसना, उसपर ही रोना 
किसी को पास पाना, किसीसे दूर होना
कि Gaming बिना भी क्या जीवन है
Updates पे Comment करे हर जन है

कोई करे Download तो कोई Upload
Wi-Fi बनी दुनिया, क्या दफ्तर क्या रोड
कि Website बनाना बिज़नस का धर्म है
उसपर बढा-चढ़ा कर लिखावट का नियम है

कि नौकरी मिलती Job-Portal से, विज्ञापन  हुआ  पुराना
किसी भी कोने से ढूंढें किसीका भी ठिकाना
Blogging (चिट्ठाजगत) का एक अलग ही फ़साना है 
विचारों को रखना, प्रतिक्रिया पाना है

Online हुवे हम सब, हरदम है Mobile
दुःख भले हो जीवन में , पर Profile पर है Smile :-)
Virtual इस जीवन से खुश तन-मन-धन व् लगन है 
 कितना भी डूबे हो फिर भी लगता ये कम है....



Tuesday, April 6, 2010

Feelings...















Evokes up in the solitary light;
My feelings have a zoomy sight
Pleasant in the morning, blissful and bright
Midday's are calm with unexpressed delight
Evenings encouraging give intimate insight
And what should I tell you about the night
They cross all barriers and simply ignite
Alas! Its tough to understand my plight
Again comes morning, I charge up aright
With positive aspirants that someday truth this might !!!

Thursday, April 1, 2010

चूमा है तुझे...

गीत की फैली हुई शाखाओंमें चूमा है तुझे
दो गजलों के बीच के क्षणोंमें  चूमा है तुझे
सुबह में पर्वतों के पीछे,तो दोपहर झीलों में
साँझ ढले पंछियों के घोसलों में चूमा है तुझे
सच कहूँ तो ये गिनती यूँ ही नहीं पक्की
दो और दो होठों की जोड़ में चूमा है तुझे
काली रातों में छुप के गजलों की आड़ में
पाँच-दस पंक्तियों के उजाले में चूमा है तुझे
लोगों ने जहाँ न पैर रखने को कहा
उन्ही गलियों से गुजरते हुए चूमा है तुझे
पलकें मूंदो और खोलो  उन पलों में
जो देर बहुत लगे तो बीच में चूमा है तुझे

भावानुवाद-
प्रकाश
  • उपयुक्त कविता मूल गुजराती कवि श्री मुकुल चोकसी की कविता का मेरे द्वारा किया गया भावानुवाद है.

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