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Thursday, May 6, 2010

जलते-जलते....

यूँही चले जाओगे कभी, चलते-चलते;
क्यूँ रहते हो सदा इसतरह, जलते-जलते
हर पल में खींचातानी,बेईमानी,धोखाधड़ी;
क्या इसी रास्ते ही हो तुम, फूलते-फलते ?

सिर्फ धन-सम्पति से कुछ नहीं हासिल होना;
सुख ख़रीदा नहीं जा सकता, रकम से
कोषते ही  रहते हो नसीब को हरदम;
जीते जा रहे हो मगर, मरते-मरते

मानते हो दुःख तुम पर ही है केवल
नज़रों को झुकाओ किसी कोने-रस्ते
'प्रकाश' आता ही है हर अँधेरे के बाद;
क्यूँ बहक जाते ही, बढ़ते-बढ़ते
-
प्रकाश जैन
४.५.१०

2 comments:

Anonymous said...

superb.........

KAPIL BAHETI said...

Wahh.. Pure Reality!!

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