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Monday, October 26, 2009

इस फलक से.........

इस फलक से उस फलक तक ज़िन्दगी अजीब है
पल में गम हैं, पल में खुशियाँ, महफिलें लजीज हैं
इस फलक से.........

बिखरें सपने इस तरह से, आँखों में नमी सी है
छाया है रिश्तों में कोहरा, विरानियाँ अज़ीज़ है
इस फलक से.........

क्यां कहें, कैसे कहें, दिल कि ये हालत किसको खबर
कुछ नहीं गम ही सही , अब हमें नसीब है
इस फलक से.........

ढूंढ़तें हैं हम अपनी चाहत मयखानों में दर-बदर
इश्क में डूबें हैं जबसे, हम बनें मरीज़ हैं
इस फलक से.........

लि:
कमाल - प्रकाश

About Poetry:

This one is very special one for me. For the first time I and my dear friend Kamaal Trivedi have tried to pen down together and more to add he has composed and has given voice to the writing .
So this is a start to duo Kamaal - Prakash, lets see how we progress....

3 comments:

hardik said...

bhai good poem .............i like it.....bhaibandi ni kavita laho ne yar..


hardik thakkar

Rashmi said...

Bohot khoob !!

Anonymous said...

ज़िंदगी की सारी खुशिया समेटनी है..
पर नसीब हमारा फटी हुई कमीज़ है....
इस फलक से......


Nilesh parmar....

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