THEMES

LIFE (52) LOVE (28) IRONY (25) INSPIRATIONAL (9) FRIENDSHIP (7) NATURE (3)

Wednesday, December 30, 2009

मुश्किल है...



सूखे वृक्षों पे पक्षियों का आना, मुश्किल है
बिना भूख भोजन कर पाना, मुश्किल है
मोह-माया रख बैरागी बन जाना, मुश्किल है
देवालयों में इश्वर को पाना, मुश्किल है
अभ्यास बिना निपुणता पाना, मुश्किल है
साहस बिना सफलता पाना, मुश्किल है
दुश्मन से प्रसंसा पाना, मुश्किल है
धनिक को घमंड न आना, मुश्किल है
पहले प्यार को भुलाना, मुश्किल है
पहली दुत्कार को भुलाना, मुश्किल है
क्रोध को काबू कर पाना, मुश्किल है
संयम रखकर जी पाना, मुश्किल है
बुरा देख आवाज उठाना, मुश्किल है
सच्चाई की राह पे जाना, मुश्किल है

मुश्किल है मगर सब मुमकिन है
बिना प्रयास के मुमकिन कर पाना, मुश्किल है
-
प्रकाश जैन
३०.१२.०९

Friday, December 4, 2009

यार, वो भी क्या दिन हुआ करते थे !!!














यार, वो भी क्या दिन हुआ करते थे 
जब हम साथ जिया करते थे 
क्लासरूम हो, लोबी हो, या हो पार्किंग 
हम हर जगह कुछ नया ही किया करते थे 
यार, वो भी... 
 
एक दूजे की बड़ाई, दूजे ही पल खिंचाई
तो कभी-कभी थोडी सी कर लेते थे लडाई 
हमारे याराने को देखकर दूसरे  

अक्सर जला करते थे
यार, वो भी...

क्लास छोड़ फिल्मों मे जाया करते थे 
घर मे देर होने पर, 
एक्स्ट्रा लेक्चर कारण बताया करते थे
कितनी आसानी से घरवालों को 
हम उल्लू बनाया करते थे 
यार, वो भी...

वो साथ बैठ कर घंटों बातें
गाया - बजाया करते थे 
कभी ओरिजिनल, तो कभी तोड़ मरोड़ 
गानो को गाया करते थे
वो नौटंकी, वो शरारतें  
सब खुश हो जाया करते थे 
यार, वो भी...

वो टिफीन पर एक-दूजे का इंतज़ार 
वो कोंट्री वाली पार्टियाँ, चायवाले का उधार 
हॉस्टल में फीस्ट खाने में 
शर्तें लगाया करते थे 
यार, वो भी..

वो एक्जाम्स से ठीक पहले, 
रीडिंग मटेरिअल ढूँढा करते थे 
लाइब्रेरी मे बैठ कर नोट्स बनाया करते थे 
सिर्फ एक दिन की पढाई मे 
पूरा पेपर लिख आया करते थे 


यार, वो भी क्या दिन हुआ करते थे 

Tuesday, November 17, 2009

उल्फत तुम हमारी भी देख लो...

एक बार हमें चाह कर तो देख लो
शक है अगर तो आजमा के देख लो
नीयतें देखी तुमने कई दीवानों की
उल्फत तुम हमारी भी देख लो

गुश्ताखी की है, मुजरिम हैं तुम्हारे
सजा देनी जो है अगर तो
कुछ पल ही सही, हमें अपना कर देख लो
उल्फत तुम हमारी भी देख लो

जीवन के रास्ते चुनौतियों से भरे
जो साथ दे सके उस राही को देख लो
हमारे ख्यालों को कभी, अपना के देख लो
उल्फत तुम हमारी भी देख लो

Sunday, November 8, 2009

प्रकृति का क्या कहे...








प्रकृति का क्या कहे, एक अजब अफसाना है
कण - कण में एक नाता, जाना- पहचाना है
दिन के उजाले की, बागडोर संभाली सूरज नें,
निशा की चांदनी को, हमने चांद से जाना है

हरदम बहते रहकर, हर प्यास को बुझाना है
नदी की ये कर्मठता, उसे सागर से मिल जाना है
धीर- गंभीर, अडिग खडे रहते है जो हरदम
उन पहाडो- चोटीयो को आसमा से मिल जाना है

लदे भले ही रेहते हॉ, पर झुकने का नाम नही
वृक्ष जो छाया देते है, उनको कभी आराम नही
जिन मोहक पुष्पो से बनता, हर मौसम आशिक़ाना है
उन्हे खिलना कांटो के बीच, पर जीवन को मेह्काना है

हरियाली खडी फसल की, देखने ही बनती है
पर भूख मिटाने जीवन की, इसको कट जाना है
पशु और पक्षीयो के सौंदर्य का कौन नही दिवाना है
उनका सिर्फ एक लक्ष्य, बस चहकते जाना है

शब्दो की कमी मेहसूस हुई, ऐसा अजब फसाना है
मौसम बदले, वक़्त बदला, पर इन्सा बेगाना है
देरी अब जो की तो, पड सकता पछ्ताना है
प्रयास हमे मिल करना है, प्रकृति को नष्ट होने से बचाना है ..
-
प्रकाश जैन
६.११.०९









Image courtesy: Ms.Meghna Bhatt

Saturday, October 31, 2009

काला घोड़ा - Dedicated to All Barodians















उन्होंने कहा - कि हर चौक पर
नाम रखे इन्सां - भगवान के
बेचारे जानवरों के लिए कुछ नहीं छोडा ?
हमने कहा - आइये बडोदा में
दिखलायें आपको काला घोड़ा

यह ऐसा है घोड़ा जिस पर बैठे हैं
महाराजा सयाजीराव ताने सीना चौडा
पर ये भी है विडम्बना,
कि इसने उन्ही के नाम को पीछे है छोडा

इसने सीधे रस्ते को है दो दिशाओं में मोडा
और इसके आसपास अकस्मातों ने
न जाने कितने निर्दोषों का सिर है फोड़ा

भई ! ये है बड़ा निगौडा
इसे कहते हैं सभी काला घोड़ा


Few Words on Kala Ghoda, Vadodara

Kala Ghoda is situated near the front gate of Sayaji Baug in Vadodara, Gujarat. It is a vigorous bronze statue of Maharaja Sayajirao III seated on the horse back. This statue was raised by the admirers of the king in commemoration of his silver jubilee in 1907. The English artist F Derewett Wood was the architecture who constructed the Kala Ghoda.

Few Words on Poetry:
This was my first poetry written with fun which later was identified as irony (vyang). This poetry made me win the first prize at university level (M.S University, Vadodara) under the category of "My Own Poetry", where participant recite self written poetry. .

Friday, October 30, 2009

कुछ बातों को


कुछ बातों को जिंदा ही दफना दिया जाता है,
हकीक़त पर पर्दा गिरा दिया जाता है
जीवन के सफ़र में हररोज़ होते हैं हादसे
नाम कुछ का इन्ही में से मिटा दिया जाता है

कुछ लोग होते हैं जो जान जाते हैं राज़ सारे

जिनके आगे हर ताला खुल जाता है
ज़िन्दगी एक जाम करें इन दोस्तों के नाम
इनके होने से जीने का मज़ा आता है

Monday, October 26, 2009

इस फलक से.........

इस फलक से उस फलक तक ज़िन्दगी अजीब है
पल में गम हैं, पल में खुशियाँ, महफिलें लजीज हैं
इस फलक से.........

बिखरें सपने इस तरह से, आँखों में नमी सी है
छाया है रिश्तों में कोहरा, विरानियाँ अज़ीज़ है
इस फलक से.........

क्यां कहें, कैसे कहें, दिल कि ये हालत किसको खबर
कुछ नहीं गम ही सही , अब हमें नसीब है
इस फलक से.........

ढूंढ़तें हैं हम अपनी चाहत मयखानों में दर-बदर
इश्क में डूबें हैं जबसे, हम बनें मरीज़ हैं
इस फलक से.........

लि:
कमाल - प्रकाश

About Poetry:

This one is very special one for me. For the first time I and my dear friend Kamaal Trivedi have tried to pen down together and more to add he has composed and has given voice to the writing .
So this is a start to duo Kamaal - Prakash, lets see how we progress....

Wednesday, October 21, 2009

वाह बेमिशाल !!

















आज अचानक ही मन में आया ये ख्याल

चलो करें कुछ ऐसा कि हो जायें निहाल
क्या करें, कैसे करें, ये उठ रहे सवाल ?
दिल-दिमाग में हो रही है कुश्ती, हाल है बेहाल

संगीतमय करें कुछ, जहाँ साज़ हो, सुर-ताल
धुन बने अनोखी, ग़ज़ल भी हो कमाल
स्वरबद्ध करें ह्रदय से, संगत में हो करताल
कि सुननेवाले कह उठें, वाह बेमिशाल !!

लिखें कोई कविता, उमदा हो ख्याल
व्यंग हो करार, करे असर तत्काल
भाव हो अंतः का, जीवन पे हो प्रकाश
कि पढने वाले कह उठें, वाह बेमिशाल !!

Wednesday, October 7, 2009

आसान नहीं...


हर चाह को पाना, आसान नहीं,
गम में मुस्कुराना, आसान नहीं
सफलता के रास्ते टेढ़े-मेडे बड़े
सही रास्ता पाना, आसान नहीं
जिन्हें प्यार किया हो दिल से
उन्हें कभी भी भुल पाना , आसान नहीं
शब्द जुड़ते हैं बनती है सरगम
बिना सरगम के गाना, आसान नहीं
खुशनुमा हादसे भी होते हैं जीवन में कभी
हादसों को पुनः दोहराना, आसान नहीं
सलाह- सीख दे सकता है हर कोई
पर उन्हें खुद अपनाना, आसान नहीं
हो लाख समझदारियां हममे भले
स्वयं को समझाना, आसान नहीं
आजमा लेते हैं दूसरों को हरदम
खुद को आजमाना, आसान नहीं
विचारों के संयोजन से बनती है कविताएँ
पर हमेशा एक से विचार पाना, आसान नहीं

-प्रकाश जैन
लि: ०७.१०.२००९

Thursday, September 10, 2009

जीवन हर क्षण...


जीवन हर क्षण क्यूँ इतनी परीक्षाएं?
व्यर्थ ही क्यूँ देनी पड़ती इतनी समीक्षाएं?
लाख कोशिशों के बावजूद,
क्यं कभी-कभी ही मिलती सफलताएं ?
सीख और ज्ञान बाँट रहा है हर कोई,
पर क्या जरुरी है उसे हम अपनाएं ?
जानते व् मानते हैं खुद को चतुर
पर क्यूँ न समझे कोई हमारी विशेषताएं ?
लोगों में प्रसन्न रहना तो है एक दिखावा
गम छुपा है कितना , क्या बोलें - क्या बतलाएं ?
तजुर्बे-जिंदगी-गम झेलकर हुआ है ऐसा
कि सोचतें हैं चलो फिर से आजमायें

जीवन हर क्षण क्यूँ इतनी परीक्षाएं?

व्यर्थ ही क्यूँ देनी पड़ती इतनी समीक्षाएं?

Tuesday, September 1, 2009

क्या हमारी आकांक्षाएं थमी है कभी ?

क्या हमारी आकांक्षाएं थमी है कभी ?
क्या हमारी खोपडी भरी है कभी ?
हर तरफ झूठ का छाया है कोहरा,
क्या हमने सत्य को आजमाया है कभी ?
अपने सुख के पीछे भागते फिरते हैं,
क्या किसी अनजाने को हंसाया है कभी ?
कितने ही दोस्त बने इस दुनिया में
क्या हमने दोस्ती को निभाया है कभी ?
कटु वचनों का निशदिन कर रहे प्रयोग,
क्या मीठे बोलो ने रुलाया था कभी ?
उजाड़ते जा रहे प्रकृति को हर तरफ,
क्या एक पौधा भी हमने लगाया है कभी ?
चिंतित है सोच कर पूरी दुनिया कि समस्यायें,
पर क्या एक को भी हमने सुलझाया है कभी ?

Saturday, August 29, 2009

आज फिर सपनो में













आज फिर सपनो में कोई आया है
आज फिर यादों ने अपनापन जताया है

ये कैसा है नाटक, किसने पर्दा उठाया है?
नायक बने हैं हम, उन्हें नायिका बनाया है
आज फिर ....................................

उद्घोषक है मित्र जो है जाना पहचाना
और संगीत भी हमारे अपनों ने ही बजाय है
आज फिर ....................................

करना है अभिनय प्यार का, दृश्य है प्रणय का
ऐसा दिग्दर्शक ने बताया और समझाया है
आज फिर ....................................

कि किया हमने अभूतपूर्व अभिनय
क्यूंकि साथ जो उनका पाया है
आज फिर ....................................

अरे ये क्या ? ये किस कमबख्त ने पर्दा उठाया है ?
ये था एक नाटक ऐसा हमें आभास कराया है
आज फिर ....................................

Monday, August 3, 2009

ख्यालों में......

ख्यालों में वो आये तो बड़ी गफलत होगी
और उन्हें भी जो हम याद आये तो रौनक होगी

ये ख्यालों ने भी की कितनी मेहनत होगी
कहीं यूँ तो नहीं?, कि उन्हें हमारी जरुरत होगी
चलो ! कहीं शांत कोने में बैठ जायें
कि ख्यालों को आने में सहूलियत होगी
पूछे ख्यालों से खैरियत उनकी
कि यूँ अचानक आने की कुछ तो वजह रही होगी??
कि बढाएं पहचान ख्यालों से
या फिर दे दें रिशवत, कि आये रोजाना
क्यूंकि हमें तो उनकी हररोज़ जरुरत होगी
कि कब थमेगा ये ख्यालों का सिलसिला
और कब हमारी शाम हसीं होगी ???
कि जाने कब हमें मोहब्बत होगी.......???
-
प्रकाश जैन
१८.७.०९

Friday, July 17, 2009

चिंता नोट कमाने की


हर इंसान को चिंता है आज, नोट कमाने की
मंशा रखता है हर कोई, रातो-रात अरबपती बन जाने की
हर इंसान को....................

रिश्ते-नाते, संबंधी-समाज,
सब में लगी है होड़, एक-दूसरे को आजमाने की
हर इंसान में व्याप्त है ये तृष्णा,
आशा करता जिसे जल्द से जल्द मिटाने की
हर इंसान को....................

इसी के कारण है चोरी-लूट व् अत्याचार
और यही है कारण, गुनाहों के बढ़ जाने की
बच्चे हो, बुढे हो, या हो युवा
सबकी आकांशा है बस, जेब छलकाने की
हर इंसान को....................

क्यों, कितना और कैसे कमाना ?
ये नही है चिंता का विषय आज ,
क्योंकि ये तो है एक हवस, अब पुरे ज़माने की
हर इंसान को....................

नोटों के लालच ने सबको अँधा बना दिया
प्रेम-दया, धर्म-समाज, सबको सबने भुला दिया,
अरे ! अब तो जरुरत है
इस लालच के खिलाफ, एक जनजागृति फैलाने की
हर इंसान को....................

Wednesday, July 8, 2009

महंगाई का अटैक

महंगाई का अटैक
हर किसी को आज कल है रहा अटैक
महंगाई का अटैक, कम कमाई का अटैक
घर चलाने में रहा लुगाई को अटैक
बच्चों को पढ़ाई में रहा अटैक
महंगाई का ............
शिक्षित युवाओं को रहा बेरोज़गारी का अटैक
अशिक्षितों को जीवन ही दिला रहा अटैक
महंगाई का ............
चुनावों के नतीजे दिला रहे नेताओं को अटैक
पिट रही है फिल्मे रहे कलाकारों को अटैक
महंगाई का ............
जगह-जगह हो रही हिंसा, बढ़ गए अत्याचार अनेक
माओवादियों के अटैक, आतंकवादियों के अटैक
महंगाई का ............
अमीरों को अमीरी ही दिला रही अटैक
गरीबो को गरीबी से रहा अटैक
महंगाई का ............
चारों तरफ़ छाया है भ्रष्ट विवेक
कोई है सच्चा, ही कोई नेक
महंगाई का ............
एक दूजे से जलन, समस्याएँ अनेक
हर कोई है क्रोधी, छाया है अतिरेक
महंगाई का ............
नई-नई बीमारियाँ से रहे अटैक
संयम, समता, और कारण है अनेक
महंगाई का ............

-
प्रकाश जैन
--२००९


Thursday, July 2, 2009

जीवन एक चुनौती...


जीवन एक चुनौती

जीवन एक चुनौती, जो हमने स्वीकारी है
दुःख, मुश्किल, चिंता से कौन डरे,हम तो उनके आभारी हैं
जीवन एक चुनौती...........

" सुख आनंद है पल भर का ,दुःख निशदिन सहचारी है"
ये वो हैं कहते जिन्होंने डर कर हिम्मत हारी है

जीवन एक चुनौती.................

"हर जन हर पल खुद को कोषे, दुःख मुझ पर ही क्यूँ हावी है???"
ढूंढ रहा जग बैठे बैठे दुःख के ताले की चाबी है
जीवन एक चुनौती.............

लालच, स्वार्थ,घमंड-अशन्तुष्टि, ये सब बालाएं भारी है
सब जानकर भी इनको अपनाते हम कितने अत्याचारी हैं
जीवन एक चुनौती................

मेहनत्त, संयम,निस्वार्थ भावना,जिस-जिस ने स्वीकारी है
प्रेम-सहज बन जाता जीवन, दुःख को होती लाचारी है

जीवन एक चुनौती, जो हमने स्वीकारी है
दुःख, मुश्किल, चिंता से कौन डरे,हम तो उनके आभारी हैं......
जीवन एक चुनौती..................

-प्रकाश जैन
०७-०२-२००९

Monday, June 29, 2009

Attraction And Love


Attraction and Love

Why do people like or dislike each other?

Why, among the countless people we meet during our lives, do we have especially intense positive feelings toward only a few the persons with whom we fall in love?

-Findings are surprising.

Interpersonal Attraction: Why we like or dislike others?

Think of some one you like very much, some one you strongly dislike and some one you’d place in the middle of this dimension. Now ask yourself

Why do you have these reactions???

  • Propinquity: Nearness makes the Heart Grow Fonder

Many friendship and romances start when individuals are brought into contact with one another. often by chance. We tend to form relationship with people who sit nearby in class, live in our neighborhood , work in the same office. So, propinquity-proximity or physical closeness to others-is an important interaction.

This is known as Frequency-of-Exposure Method.

  • Similarity: Liking Others Who Are Like Ourselves

Why do we like others who are like ourselves?

The most plausible explanation is that such persons provide validation for our views or our personal characteristics. That is, if another person agrees with us , or is similar to us in behaviour,

This indicated that our views, preferences and actions are correct- or at least shared by someone else. This makes us feel good and our liking for the other person increases. Whatever the precise mechanism involved, similarity is certainly one powerful determinant of attraction.

  • Affective States: Positive Feelings as Basis For Attraction

Positive feelings or moods- what ever their source-cause us to like others we meet while experiencing them; negative moods-again-again whatever their source-cause us to dislike others we meet when we are feeling low.

If our positive feelings are produced by something another person says or by the person looks , we will tend to like that individual. But even if our positive feelings have nothing to do with the person- we may still experience a boost in our liking for the person.

  • Physical Attraction : Beauty May Be Only Skin Deep, But We Pay lots of Attention to skin

Perhaps the most obvious factors affecting interpersonal attraction is physical beauty. Research findings indicate that, alas, we are indeed suckers for a pretty or handsome face.

Why is this case?

One reason is that physically interactiveness is associated with good reproductive capacity; choosing attractive mates, therefore is one strategy for increasing our chances of contributing our genes to next generation.

LOVE: The Most Intense Form of Attraction

Romantic Love: A form of love involving feelings of strong attraction and sexual desire towards another person. However, there are several other kinds of love too, such as the love of parents for their children, or the kind of love one can observe in couples who reach their fiftieth wedding anniversary (known as being companionate love).While these kinds of love are not the focus of as many television programs or films as passionate love, they too are recognized by psychologist as being very important.

So what, precisely does romantic love involve?

Most experts agree that three components are central:

  • Before we say that we are “in love”, the idea of romantic love must be present in our culture. It is difficult if not impossible for people to say when it is lacking “I am in Love”.
  • We must experience intense emotional arousal when in the presence of an appropriate person- someone defined by our culture as suitable object for such feelings.
  • These feelings must be mixed with the desire to be loved by the object of our affection, coupled with fears that the relationship might end.

Only, if these conditions are present can we state with certainty, “I’m in love”.

LOVE: How and Why It Occurs?

Although it is a powerful reaction-one of the strongest we ever experience-romantic love often develops quite suddenly. Many people report that falling in love feels like being stuck by emotional lighting.

How can such powerful reaction develop so quickly?

  • We are prepared to fall in love by our earlier relations.
  • Through reproductive success of our species depends on two factors:

1) A desire on the part of men and women to engage in special intercourse, and

2) An interest in investing the time and effect required to feed and protect offspring.

Pure Lust, which would ensure only sexual behaviour, was not sufficient; so over time, human being with a propensity to form long-term relationship- to fall in love.

The result: We are genetically programmed to fall in love.

LOVE: Why It Sometimes Dies/Why Love Fades?

  • Boredom
  • Jealousy
  • Self Defeating Behaviors
  • Increasing Negative Effect
  • Fearful Avoidant Attachment Style
  • Growing Recognition of Dissimilarity

Some Guidelines for having a Happy Romantic Relationship:

· Never both be angry at the same time.

· If one of you has to win an argument, let it be your mate.

· If you must criticize, do it gently.

· Never bring up mistakes of the past.

· At least once a day, say something kind or complimentary to your partner.

· When you have done something wrong, admit it and ask for forgiveness.

· Never go to sleep with an argument unsettled.

· Never take your partner for granted.

Pay attention, step forward in right direction.

Wish you a very happiness….

With Love

Prakash Jain

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