THEMES

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Thursday, April 30, 2015

उदाहरण कुछ करके दीजिये, लोग बेहतर समझेंगे



अमीरी दिलों-रिश्तों में हो तो कुछ बात है 
कोठी-जायदादों में भला क्या रक्खा है
सम्बन्धो में बनना-बिगड़ना लगा रहता है 
प्यार ढूंढिए आपने आपमें ही छुपा रक्खा है 

फ़ोन- इंटरनेट से चले; संपर्क हेंग ही हुवे  
दिखावटी इस सोसियलपने में क्या रक्खा है 

राजनीति वादों से ही है चलती रही सदा   
फ़िज़ूल उम्मीदों को सबने बनाये रक्खा है 

भ्रष्ट को ही ट्रस्ट आप बस करते जाइए 
इन आदतों को हमने ही बढ़ा रक्खा है 

एक अरसे से कर(tax) भरकर भी न विकसित हुवे 
इस ईमानदारी को मुश्किल से बनाये रक्खा है 

उदाहरण कुछ करके दीजिये, लोग बेहतर समझेंगे 
सलाह-मश्वरे कोरी बातें हैं, बातों में भला क्या रक्खा है 


शब्दार्थ:
हैंग (Hang) - रुकावट, अटक जाना का अंग्रेजी शब्द (आजकल आम समस्या है :-)  )   
सोसियलपना - अधिक सामाजिक होने के दिखावा जो केवल यांत्रिक है (नया प्रायोगिक शब्द अंग्रेजी मिलावट के साथ),  


करीब एक साल बाद कुछ शब्द-प्रयोग हुवा। कैसा लगा बताइयेगा ?



Wednesday, December 31, 2014

चलो फिर नए से शुरू करते हैं...


Tuesday, April 22, 2014

ये नेता है, रंग बदलेंगे

ये नेता है, रंग बदलेंगे 

कुछ चुनावों से पहले 

कुछ चुनावों के बाद. 
कभी चुनावी साथी
कभी संग बदलेंगे 
ये नेता है, रंग बदलेंगे 

कुछ मौन रह कर 
तो कुछ बकबका कर, 
कुछ बस नौटंकियों से
देश का ढंग बदलेंगे 
ये नेता है, रंग बदलेंगे 

जाति-धर्म में बांटेंगे  
इतिहास नए सुनाएंगे, 
लुभावने से वादे देकर 
जनता को बस ठग लेंगे 
ये नेता है, रंग बदलेंगे 

कोशिश इस बार करें  
सोचें-जानें-समझें फिर चुनें 
वर्ना फिर इनका क्या है 
नस्ल गिरगिटिया, रंग बदलेंगे 
ये नेता है, रंग बदलेंगे 

Wednesday, March 19, 2014

मालाएं... A Photo Poetry

Through the Viewfinder - Photographs by Aditya


मालाएं हैं ये उन फूलों की 
प्रतिक है जो
श्रद्धा के, आस्था के 
हर देवालयों में अर्पित  
कहीं प्रार्थना तो कहीं बन दुवाएं 

सजता है, महकता है 
इन्ही से हर श्रृंगार 
इन्हे पहनाकर संबंध बने 
दिल एक हुवे परिवार 

ये बरसे आदर-हर्ष में 
हर उत्सव, हर त्यौहार 

जो ख़ुशी से आते हैं 
संग हँस लेती हूँ 
जो शोकाकुल आये 
गम बाँट लेती हूँ 
मेरे लिए तो ये हैं बस 
पेट पालने का आधार 


A Creative JV of Photography (Aditya) and Poetry (Prakash). Aditya is my colleague and friend. Away from HR (human resource) this is a experimentation on different areas of creativity. This one was clicked at Khanderao Market, Vadodara, Gujarat.   
Facebook page of Aditya :https://www.facebook.com/photosbyaditya


Sunday, February 2, 2014

अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए...
















अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए 
सच्चाई लुप्त होती जा रही पढ़नेवालों के लिए 

एक वक़्त था जब हर सुबह रहता था इंतज़ार 
अब मंगवाते हैं आदतन; रश्म निभाने के लिए 

कागज़ भी बेहतर हुवा, छपाई अब रंगीन 
क्या बस यही काफी हे बेहतर बनाने के लिए? 

सम्पादकीय असर में डूबे, लेखों में कसीदे 
पत्रकारिता स्तरहीन पहला बन पाने के लिए 

समाचारों में विज्ञापन या विज्ञापनों में समाचार 
टंटोलना पड़ता है हर कोना समझ पाने के लिए 

'प्रैस' कहलाना औहदा बना, कहीं बना व्यवसाय 
कहीं जरिया जनता को, गुमराह बनने के लिए 

माना कुछ होंगे शायद आज भी सच्चे-ईमानदार 
दौर मुश्किल बड़ा इस राह चलनेवालों के लिए  

अखबार छपते ही हैं अब तो रद्दिवालों के लिए... 


Theme by : Shree Navin C. Chaturvedi (http://thalebaithe.blogspot.in/)

श्री नवीन सर के एक फेसबुक स्टेटस से ये विचार आया/ उठाया और आगे जो हुवा वो आपके सामने प्रस्तुत :-)


Monday, December 9, 2013

कलम की चित्रकारी....





कवितायेँ जो लिख देते हैं तुम पे 
चलते- फिरते,सोते- जागते 
पड़ी रहती हैं, अक्सर 
डायरी- नोटपैड के पन्नों पे
कुछ मोबाइलिया बनी 
त्वरित संदेशों में,  
कुछ कहीं किताबों के बीच 
अकेली, गुमसुम  
तो कुछ अस्त-व्यस्त, बेसहारा
कुछ तो बस खो ही गयी, 
उन्हें याद कर पाना भी मुश्किल है 
हर अनुभव, हर ख्याल तुम्हारा ही तो है 
बस शब्द मेरे हैं टूटे-फूटे
तुम्हे अच्छे लगते हैं न, शायद  

चित्रकार होते
तो बात अलग होती जरा 
कतारें लग जाती तुम्हारी तस्वीरों की 
हर इक अदा को रंग देते, 
हमारे रंगों से
केनवास इतराता खुद पर   
एक संग्रहालय बनाना पड़ता
इन निशब्द मगर 
बोलती तस्वीरों को रखने 
सहेजने खातिर 

माना इस कला से दूर हैं  
पर क्या ये सच नहीं 
मेरे शब्द बना ही तो देते हैं, एक तस्वीर 
हर बार, हर कविता में 
क्या ये नहीं,  
कलम की चित्रकारी ?  

Saturday, November 30, 2013

पल्लवी




पल्लवी और अजय की अभी - अभी कुछ महीनो पहले ही शादी हुई थी।  संयुक्त परिवार में सास- ससुर, भाई-भाभी और उनके बच्चों के बीच वो खुद को ढालने कि कोशिश कर रही थी। कुछ दिनों से अजय की तबियत ठीक नही थी । कई डॉक्टरों  को दिखाने पर भी कुछ ख़ास फर्क नहीं हो रहा था। 

शहरों में दूर के रिश्ते भी बड़े करीब के हो जाते हैं, बस ऐसा ही कुछ करीबी रिश्ता हमारे परिवारों में भी था। 

कल ही संजय भैया, अजय के बड़े भाई का फ़ोन आया था और बता रहे थे। शाम को मैं घर पहुंचा तो सब जानने मिला। "कितनी बार कहती थी बाहर का खाना-पीना कम कर दे, पर मेरी कौन सुनता है।" माँ के गुस्से में चिंता साफ़ दिख रही थी। अजय वहीँ पास में सो रहा था, काफी कमजोर पड़ गया था। संजय भैया से थोड़ी देर बात हुई, और फिर मैं घर कि और रवाना हुवा।   

दो दिन बाद सुबह-सुबह फ़ोन आया हेल्लो ! आज कॉलेज से छुट्टी ले सकते हो क्या ? थोडा काम हैअजय को हॉस्पिटलाइज़े किया है; दुकान पर भी आदमी छुट्टी पर है बस आज के लिए आ जाओ। ना कह पाने का कोई विकल्प नहीं था। ठीक है, आता हूँ थोड़ी देर में। फटाफट तैयार होकर उनकी दुकान के लिए निकला, रास्ते में मैं सोच रहा था 'आज का कॉलेज का बंक किसी के काम आएगा वर्ना अक्सर तो यूँ ही यार-दोस्तों में, फिल्म देखने और घूमने-फिरने में चला जाता है। 

दुकान पहुंचते ही मैं और संजय हॉस्पिटल रवाना हुवे। "आप रुकिए यहाँ, डॉक्टर कि विजिट का टाइम है मैं होकर आता हूँ", संजय ने पिताजी से कहा। डॉक्टर विजिट को निकल चुके थे, चैम्बर खाली देख हमने अंदाज़ा लगाया।  हॉस्पिटल में चहलकदमी बढ़ गयी थी, रूम तक पहुंचे तो डॉक्टर अजय कि जांच कर रहे थे, उनके साथ असिस्टेंट डॉक्टर्स, नर्स आदि का पूरा काफिला था।  "कुछ टेस्ट लिखे हैं, अभी करवा लीजिये, रिपोर्ट के साथ शाम को मिलिए" डॉक्टर ने संजय से कहा। सिस्टर ने ब्लड बैंक में फ़ोन कर दिया। 

पल्लवी अजय के बेड क पास ही बैठी थी , मैं बहार आ गया। संजय फ़ोन पर थे मैं सजनी भाभी (संजय कि पत्नी) के पास बैठ गया और बिना विलम्भ किये क्या हुवा जानने कि कोशिश की। 'अच्छा हुवा आप आ गए, संजय काफी अकेले पद गए थे, दो दिन से दस्त और उल्टियां हो रही थी, खांसी और कफ भी इतना हो रहा हैकल तो रात भर यही चला इसलिए आज सुबह यहाँ लाये और डॉक्टर ने देखते ही एडमिट कर दिया, दो बोतल चढ़ बाये हैं।' वो पूरा एक सांस में केह गयी। 

तभी लैब अटेंडेंट आ गया, उसने ब्लड सैम्पल्स कलेक्ट किये और मुझे रसीद देकर शाम को कलेक्ट करने को कहा। भाभी ने पूछा कौन-कौन से टेस्ट करवाये हैं, हेमोग्लोबिन तो कम ही आएगा, कहीं चिकनगुनिया न हो जाए आज कल रोज पेपर में आ रहा है। संजय ने मुझे भाभी को घर ड्रॉप करने को कहा। पुरे दिन घर, दुकान और हॉस्पिटल  के चक्कर चलते रहे।

शाम को रिपोर्ट लाने मुझे ही जाना था, मैंने रिपोर्ट कलेक्ट की और जिज्ञासापूर्वक खुले लिफ़ाफ़े से रिपोर्ट निकाली। अटेंडेंट ने दस्तखत करने को कहा और पूछा पेशेंट कौन है? मैं इस सवाल को समझ नहीं पाया, ज्यादातर मरीज कौन है ऐसा कोई पूछता नहीं। रिपोर्ट देखते ही मैं चौंक गया HIV Antibody Test - Reactive/ +ve… मैं बस वहीँ बैठ गया और कुछ समझ नहीं पा रहा था तभी फ़ोन बजा 'कहाँ हो, रिपोर्ट मिली? क्या आया देखो जरा? तुम्हे थोडा समझ आ जाएगा, मुझे तो अंग्रेजी आती नहीं।' हाँ भैया, बस आता हूँ ! सब नॉर्मल ही लग रहा है...मैंने फ़ोन पर कुछ बताना उचित नहीं समझा।

हॉस्पिटल पहुँचते ही ‘चलो जल्दीडॉक्टर साहब से मिल लेते हैं, मेरे ना चाहते हुवे भी वो मुझे चैम्बर में ले गए। रिपोर्ट्स देख डॉक्टर ने कहा एक टेस्ट पॉजिटिव आया है लेकिन रिकन्फर्म करने के लिए बड़े एडवांस लैब से भी एक रिपोर्ट करवा लेते है। सर, डू यू सजेस्ट फॉर पल्लवी टू? मैंने पूछा। ओ यस, आई वाज कमिंग ऑन देट. उनका भी करना है मैं लिख देता हूँ, मेडिकल स्टूडेंट ? उन्होंने मुझसे पूछा, 'नहीं थोडा बहुत पता है इस बारे में' मैंने उत्तर दिया और हम दोनों बहार आ गए।      

माहोल और भी चिंताजनक हो गया था। 'तुम तो केह रहे थे सब नॉर्मल है, क्या आया है देखो जरा ध्यान से ! और ये पल्लवी का टेस्ट क्यूँ करना है ?... मैं समझ नहीं प् रहा था कि संजय को कैसे बताऊँ। मैं लैब वाले को बुलाने का बोल के आता हूँ आप अजय के पास चलिए, वहीँ बैठते हैं।  

वहाँ से निकला तो सामने सजनी भाभी आते दिखे, 'क्या आया रिपोर्ट में ? चिकनगुनिया तो नहीं है नजो भी आया है बताइये, संजय भी कुछ बता नहीं रहे ..प्लीज भैया, और ये पल्लवी का टेस्ट क्यूँ कर रहे हैं.. उनसे छुपा पाना मुश्किल था इसलिए वहीँ पास बिठा कर मैंने रिपोर्ट बताया।  उन्हें समझने में देर न लगी फिर भी खुद को सँभालते हुवे, दूसरी रिपोर्ट में नेगेटिव आ जाए भगवान् !  पर ये हुवा कैसे? मैंने पूछा इधर में खून चढ़ा था क्या कभी, उससे इन्फेक्शन आ सकता है? 'नहीं मेरी शादी के बाद तो अजय पहली बार इतना बीमार हुवे हैं, पहले का पता नहीं।' अभी वाली रिपोर्ट तो सुबह ही आएगी, तब ही पता चलेगा कुछ।

सुबह लैब ऑफिस से मैंने रिपोर्ट ली और तुरंत पेपर्स देखने लगा ..ये रिपोर्ट भी पॉजिटिव ही थी। दूसरी रिपोर्ट पल्लवी भाभी की थी, HIV Antibody Test Result : Reactive/ +Ve... 

अजय अक्सर घर देरी से आते, खाने-पीने का बेहद सौखीनडेली फाइनेंस व् डेली कलेक्शन का काम करता था इसलिए ज्यादातर घूमता ही रहता था। यार दोस्ती भी काफी थी, ज्यादातर अड्डेबाजी ही करते थे।  एक-दो बार मैंने नाईट शो मूवी से घर जाते हुवे ऐसे ही दोस्तों के साथ देखा था।  याद आ रहा था एक बार कुछ लड़कियां भी थी उन सब के साथ में। मैं सब कुछ रिलेट करने कि कोशिश कर रहा था। कई सवाल घूम रहे थे दिमाग में... 

कॉलेज में और कुछ एन.जी.ओ के साथ मैं कई बार एच आई वी / एड्स अवेरनेस स्किट्स में भाग ले चूका था इसलिए रोग के बारे में पूरी जानकारी थी पर करीबी कोई इससे ग्रसित होगा ये नहीं मान पा रहा था। लैब से हॉस्पिटल का रास्ता इसी सब सोच में चला गया। 

सजनी भाभी ने दूर से मुझे देखा , मुझे देख कर ही मानो वो समझ गयी पर फिर भी उन्होंने पूछा ..  पॉजिटिव ? मैंने कहा दोनों की पॉजिटिव ... पल्लवी की भी ? आंसुओं को रोक पाना मुश्किल था।  

डॉक्टर ने रिपोर्ट पर संजय से बात की, उन्हें दोनों कि रिपोर्ट सुनते ही चक्कर आ गया, थोडा सम्भल कर वो बैठ गए। देखिये पल्लवी को अभी विंडो पीरियड में है इसलिए जल्दी कंट्रोल में आ जायेगा, पर अजय को थोडा वक़्त लगेगा। दूसरा इस रोग का प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज काफी महंगा पड़ेगा आप चाहें तो गवर्नमेंट ऐडेड ट्रीटमेंट करवा सकते हैं, आप सोच लीजिये वहाँ भी ट्रीटमेंट अच्छा ही होगा चिंता कि कोई बात नहीं है।

थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने अजय और पल्लवी को मिले 'देखिये आप दोनों का रिपोर्ट एच आई वी पॉजिटिव आया है, यह एक वायरस है जो कि खून के इन्फेक्टेड होने पर पाया जाता है, आम भाषा में इसे एड्स भी कहते हैं। इलाज सम्भव है और आप एक सामान्य जीवन जी सकते हैं, हाँ कुछ ख़ास बातें ध्यान रखें .. परहेज और नियमित जांच, दवा से सब कुछ नियंत्रित रह सकता हैआप अब फेमिली नहीं प्लान कर सकते, ऐसा अक्सर पाया जाता है कि संतान भी इस वायरस से एफेक्ट होती है।  शारीरिक सम्बन्ध जहाँ तक हो न बनाये और कंडोम का इस्तेमाल करें। कभी भी किसी को खून न दें इससे ये वायरस औरों में फ़ैल सकता है। एक दूसरे का ध्यान रखिये, एक-दो टेस्ट और करवाने हैं उसके बाद दवाई शुरू करेंगे। पल्लवी भाभी पर मानो आसमान फट गया हो, हर तरफ बस आंसू बह रहे थे। 

आंसुओं के साथ सवाल हर किसी के चेहरे पे थे, आखिर ये हुवा कैसे, क्या कारण होगा ? सजनी भाभी को न जाने कहाँ से मेरी खून लिया था क्या वाली बात याद आयी और मुझे बहार ले जाकर पूछा और किस कारण से होता है ये रोग ? मुझे नहीं पता, मैंने टालने कि कोशिश की, बताता भी कैसे और क्या .. वे बस मुझे देखती रही।

'तीन कारणो से ये रोग ज्यादातर होता है: असुरक्षित यौन सम्बन्ध, इन्फेक्टेड नीडल से खून लेने/ इन्फेक्टेड पेशेंट का खून ले लेने पर, या फिर जन्म के समय माता या पिता का इन्फेक्टेड होने पर' किसी न किसी को बताना जरूरी था ये सोच मैं तेजी से सब बोल गया। पर सवाल अब थमने वाले नहीं थे 'मतलब पल्लवी से अजय को हुवा ? मैंने तुरंत कहाँ नहीं वैसा तो नहीं हो सकता क्यूंकि उन्हें अभी इनिशियल स्टेज पे है। शायद वो और भी कुछ पूछती पर रोकते हुवे मैंने पल्लवी भाभी को सँभालने को कहा वे रोये जा रही थी। 

शाम होते-होते दूसरे टेस्ट रिपोर्ट भी आ गए और ट्रीटमेंट शुरू हुवा। आप लोग घर हो आइये थोडा आराम कर लीजिये मैंने संजय भैया और सजनी भाभी को कहा, मैं यहाँ रुकता हूँ ..वे जा नहीं रहे थेकिसी तरह उन्हें घर भेजा। मैं भी बुरी तरह थक गया था इसलिए वही रूम के बहार बैठ गया, घर पर फ़ोन कर साड़ी बात बतायी और दूसरे मिस्ड कॉल्स, मेसेज देखने लगा।  तभी पल्लवी भाभी बहार आयी , मैं उन्हें देखते ही पूछा कोई प्रॉब्लम भाभी ? आपसे एक बात पूछनी है, उन्होंने कहा और मेरे पास बैठ गयी। मैं सोच रहा था आखिर मैं रुका ही क्यूँ, अब और सवाल ! हाँ बोलिये भाभी कोई काम, कुछ लाना है

एक बात बताइये आंसू पौंछते हुवे उन्होंने पूछा 
'ये किससे किसको हुवा, इन्हे मुझसे या मुझे इनसे ???'

आज चार साल हो गए, पल्लवी और अजय सामान्य जिंदगी जी रहे हैं, रेगुलर ट्रीटमेंट चलता है। पर जब भी उन्हें देखता हूँ या उस दिन को याद करता हूँ तो ख्याल आता है कि अगर उस दिन भूल से भी मैं कुछ उत्तर देता तो आज शायद दो जिंदगियां साथ नहीं होती। कम से कम आज दोनों साथ तो हैं। पर साथ ही साथ गुस्सा भी बहुत आता है, पता नहीं क्यूँ पर अजय पर ही। वो सवाल आज भी कानो में गूंजता है अक्सर  
  


  


 Note: This was my first attempt in story writing. 
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